व्याकुल यह बादल की साँझ ~ रवीन्द्रनाथ टैगोर

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Photo-Omesh

व्याकुल यह बादल की साँझ
दिन बीता मेरा, बीता ये दिन
मेघों के बीच सघन
मेघों के बीच ।
बहता जल छलछल बन की है छाया
हृदय के किनारे से आकर टकराया ।
गगन गगन क्षण क्षण में
बजता मृदंग कितना गम्भीर ।
अनजाना दूर का मानुष वह कौन
आया है पास आया है पास ।
तिमिर तले नीरव वह खड़ा हुआ छुप छुप
छाती से झूल रही माला है चुप-चुप,
विरह व्यथा की माला,
जिसमें है अमृतमय गोपन मिलन ।
खोल रहा वह मन के द्वार ।
चरण-ध्वनि उसकी ज्यों लगती है पहचानी ।
उसकी इस सज्जा से मानी है हार ।

प्रयाग शुक्ल अनूदित रविन्द्रनाथ टैगोर की कविता (कविताकोश से साभार)

धान रोपती स्त्रियां और चरवाहे की टिटकारी – रमाशंकर सिंह की कविताएं

जमींदार का रोपनी गीत :

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Photo -Ramashankar Singh

मुझे जन्म के ठीक बाद बताया गया
पूरे गाँव में कितनी औरतें हैं
कितनी झुकती है किसकी कमर
किसकी उँगली में है जादू
कौन कम मजूरी में ज्यादा काम करती हैं

मुझे यह भी पता था कि अगले आषाढ़ में
किसकी लड़की धान लगाने वाली हो जाएगी
किसकी होगी शादी
किसे होगी कर्ज की कितनी जरूरत
सब कुछ निर्भर था
धान के रकबे पर

मुझे चावलों का स्वाद पता
उनका आकार पता
यहाँ तक कि जब वे थाली में जूठन की तरह छूट जाते थे
तब लगता था कि आसमान में तारे बिखरे हों
वे जो कनई में रोपती थीं
काला नमक और बासमती चावल
आधे पेट
नसीब नहीं हुई उन्हें
काला नमक और बासमती की खुशबू

मुझे बचपन से ही मिली सिखावन
कैसे बुलाते हैं मजूर
सुबह कितने समय जाना है उन्हें हाँककर लाने
नहीं बैठना है उनकी चारपाई पर
कायम रखनी है शरीर और वाणी की अकड़

धान रोपती स्त्रियों को देखकर
मुझे सावन में गाए जाने वाले गीत नहीं
अपने पुरखों की मूँछें और गालियाँ याद आती हैं
जो मुझे सिखायी गयीं
कैसे बुलाते हैं
धान रोपने वाली स्त्रियों को।

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Photo-Hetal Joshi

न कविता
न गीत
न सुग्गे
न धान
न पान
न कस्तूरी
न केसर
और न ही फूल भेजूँगा तुम्हें

मैं तुम्हारे लिए भेजूँगा
बांस की बनी झपली
उसी में भर लेना
हमारा आज का दिन
सुगंध
विदाई के क्षण
मिलन का ठहराव।

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Photo-omesh

समय एक स्त्री का नाम है

समय को देवता कहा गया
काल को पुरुष

इसे थोड़ा उलट दीजिए
समय एक स्त्री का नाम है
वह बम्बई से बलिया जा रही है
अपना बच्चा गोद में लिए

समय गर्भवती है
उसका चल रहा है नवाँ महीना
वह हैदराबाद से देवास जा रही है

समय एक माँ है
उसका नवजात बच्चा अभी-अभी मर गया है
उसके स्तनों में उतर आया है दूध
उसी से धुल गए हैं
इस देश के तपते हुए राजपथ।

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क़ब्र

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Photo-Omesh

क़ब्र लिए फिरता हूँ

शहर दर शहर
दर ब दर

एक क़ब्र बचपन के किसी दोस्त की है
चेचक से मर गया था वह
रेख उठान के दिनों में

एक पतली सी
मरियल किशोरी की कब्र
अंदर धँसी है शरीर के किसी कोने में

आत्महत्या किए हुए भाई की कब्र
मेरी पसलियों के ठीक नीचे है
बैसाख में चलती पछुवा से
चिता की लकड़ी तड़कती है
मद्धिम सी आवाज़ में

एक गूँगे आदमी की भी क़ब्र दफ़न है मेरे अंदर
जो कभी बोल नहीं पाया
लेकिन जिसकी आँखे हँसती थीं
किसी चरवाहे की टिटकारी तरह
मन में धँसी है
पिता की कब्र
सांझ ढलते ही
खूंटे पर लौटी गाय की तरह
आराम से सो जाती है

एक और क़ब्र है
मेरी माँ की
ठीक मेरे चेहरे के नीचे

उसके दांत चमकते हैं अँधेरी रात में
जैसे जुगनू चमकते हैं।

 

परिचय – रमाशंकर सिंह 

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रमाशंकर सिंह मूलत: स्वतंत्र शोधार्थी हैं लेकिन समाज संस्कृति और  साहित्य सभी पर इनकी पैनी नजर रहती है। इनकी कविताएं इनके शोध और सोच दोनों की खिड़कियां हैं ।

संपर्क  7380457130