माँ के लिए कुछ कविताएँ|सतीश छिम्पा

(1)

मिथक ही था कि धरती टिकी है
शेष नाग के फण पर
या बैल के सींग पर

समझ आई तो पता चला
इस धरती को आपने अपनी भुजाओं पर टिका रखा है

(2)

चूल्हे पर सिकी रोटी की चिटक देखकर
उदास होती हो आप
और रोटी मुळकती है मेरी ओर

माँ-
आटा भी जानता है कि
नमक, पानी और आग के बिना
उसका अस्तित्व कुछ नहीं

(3)

एक पांव में पोलियो होते हुए भी
आपने
इस घर की विकलांगता को खत्म कर दिया

माँ
बताओ कैसे उठा लिया आपने
एक पांव पर सदियों का संताप

(4)

हमारा घर
सदियों से संतप्त
सूखा मरु, उजाड़
बिना सपनों और उम्मीदों का ढांचा भर था

Photo- Kishan Meena

माँ-
आप बिरखा सी बरस गयी
हरख गयी इस घर की भींतें
आंगन, देहरी और छत
आप रोटी, पानी, साग और दिनों के पार खड़ी हिम्मत हो
बुझती सांसों की आस हो

परिचय-

सतीश छिम्पा सूरतगढ़ राजस्थान के रहने वाले है. लिखने- पढ़ने की भूख जो सतीश छिम्पा में है. युवा रचनाकारो में कम देखने को मिलती है. वे राजस्थानी (जोधपुरी) और हिंदी के अलावा पंजाबी, तीनों भाषाओं में लिखते है. kumarsatish88sck@gmail.com ई-मेल पर सतीश से बात की जा सकती है.