खुला दरवाजा

चरण सिंह ‘पथिक’

भैंरोंघाट से—” खुला दरवाजा “

राह बदलकर वो कमबख्त मुसाफिर चला गया ।
इंतजार में खुला हुआ दरवाजा छला गया ।।

बहुत देर से महफ़िल में सन्नाटा पसरा था 
तुम आई तो जाम हाथ का छलछला गया ।

पक्के मकां का वादा करने वाला गजब निकला
कुछ वोटों की खातिर मेरा छप्पर जला गया ।

जब तक चुप था बहुत सुखी था पर अब क्या बोलूं 
सच बोला तो सबसे पहले रेता गला गया ।

आज तेरी यादों का बादल घिर-घिर आया है
लेकिन बिन बरसे हरजाई घर से चला गया ।

“खुला दरवाजा” पर एक विचार

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