कविता और छन्द

देवानन्द आर्य

छंद का सार्वकालिक आग्रह कविता को मंचीय बना देता है और पूर्णकालिक दुराग्रह उसे जनसामान्य से निर्लिप्त कर देता है ।

छंद कविता की सपाटबयानी ढंकने का उपकरण नहीं है । छंद मुक्त कविता में सपाटबयानी यानी गद्यात्मकता की शिकायत भी कभी-कभी काव्य ग्राहिता की कमी के कारण होती है ।

कविता को जानबूझकर सरल बनाना और जानबूझकर कठिन बनाना , दोनों कविता और पाठक के हक़ में नहीं हैं ।

‘जिस तरह तू बोलता है उस तरह तू लिख’ , ही सर्वोत्तम काव्य प्रकिया है ।

कविता छंद विहीन हो सकती है लय विहीन नहीं । एक अंतर्निहित सांगीतिकता ही कविता को जीवित और चर्चित रखती है ।

कविता की पहली और अंतिम शर्त उसका कविता होना है चाहे वह छंद में हो या छंद मुक्त । कविता दोनों जगह गायब या छिछली हो सकती है , छंद में भी और मुक्त छंद में भी ।

कविता सिर्फ शिल्प नहीं होती कि शिल्प विशेष की अनुपस्थित से उसे पास या फेल कर सकें ।

गद्य कविता छंद कविता का आगे बढ़ा हुआ विकसित और अब अपरिहार्य रूप है । गद्य में होके भी कविता कविता हो सकती है , होती ही है । छंद में होकर भी कविता कविता नहीं हो सकती , अक्सर नहीं होती भी है । यह होना न होना काव्य क्षमता और समझ से जुड़ा मामला है ।

अक्सर छंद की अनावश्यक वकालत कवि में काव्य प्रतिभा की कमी के कारण भी होता है ।

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