प्रस्थान

प्रस्थान

प्रभात का समय है।
कोहरे जैसी धूप पर पौधे उतरे हैं।
ओस पर झरते क्षण कितने साफ़ हैं :
सुथरे हैं।
रास्ता ऐसे कटता है कि रक्त धमनियों का
पैरों में और लाल-आशय होता है।
[धमनियों में रक्त की गति से पैर साँस ले रहे हैं।]
हवा का हल्का स्पर्श तुम्हारे चुंबन का स्मृति-बिंब है।
[मेरे होंठों पर
मुँदी हुई आँखों का आलोक : देखो—
और स्पष्ट करो कि कहना क्या है!]
देह में आत्मा का एक कंपन
शांत नदी में ‘छपाक्’ जैसा—
कि इस अनुराग-ऋतु का नैरंतर्य एक ताप-ध्वनि की ओर मुझे ले जा रहा है,
जहाँ मैं एक ऋषि की मुद्रा में तुम्हारा ध्यान करूँगा
तो क्या आसन लगाकर बैठूँगा?—कि;
मेरी गति बाधित हो गई है?
या, मैं तुमसे कटकर रक्त की ओर प्रस्थान करूँगा?

◆ अमिताभ चौधरी

लेखक: Vijay Rahi

विजय राही ग्रामपोस्ट-बिलौना कला तहसील-लालसोट जिला-दौसा(राजस्थान) पिनकोड-303503 पेशे से सरकारी शिक्षक है। कुछ कविताएँँ हंस, मधुमती,दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका,डेली न्यूज, राष्ट्रदूत में छपी। सम्मान- दैनिक भास्कर का युवा प्रतिभा खोज प्रोत्साहन पुरस्कार -2018 क़लमकार मंच का राष्ट्रीय कविता पुरस्कार(द्वितीय)-2019 मो.नं.-9929475744 Email-vjbilona532@gmail.com

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