उन्मत्त प्रेम के महान कवि पाब्लो नेरूदा

20वीं सदी के महानतम कवियों में शुमार पाब्लो नेरूदा का जन्म 12 जुलाई 1904 में मध्य चीली के एक छोटे से शहर पराल में हुआ। नेरूदा को विश्व साहित्य के शिखर पर विराजमान करने में योगदान सिर्फ़ उनकी कविताओं का ही नहीं बल्कि उनके बहुआयामी व्यक्तित्व का भी था।
नेरूदा सिर्फ़ एक कवि ही नहीं बल्कि राजनेता और कूटनीतिज्ञ भी थे। 1971 में नेरूदा को फ़्रांस में चिली का राजदूत नियुक्त किया गया। पाब्लो नेरूदा को 1971 में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

नेरूदा की कविताओं में एक सधी हुई छटपटाहट है ,जिसमें हम नया खोजने ,नये सपने देखने और नयी कल्पनाएँ रचने का सुराग पा सकते है।
“एक मई पर इतनी कविताएँ हैं,
कि अब मैं केवल दूसरी के बारे में लिखता हूँ।”

विश्व की ऐसी कोई भाषा नही जिसमे नेरूदा की कविताओं का अनुवाद ना हुआ हो।नेरूदा की कविताएँ अन्धकार भरे समय में रोशनी सरीखी है।
नेरूदा कहते है—
“मैं चाहता हूँ मिट्टी,आग,रोटी,शक्कर,गेंहूँ,समुन्द्र,किताबें और जमीन
सभी मनुष्य के लिए ।”

गीत चतुर्वेदी ने नेरूदा की कविताओं पर बात करते हुए लिखा है कि “प्रेम नेरूदा की कविताओं का खाद्य है। वह प्रेम को खाते हैं, तभी कविताएँ लिखते हैं। यह पंक्ति हर कवि के लिए कही जा सकती है, लेकिन प्रेम का वैसा वैभव हर कवि के यहाँ नहीं मिल पाता। प्रेम सफ़ेद पंखों वाला एक बूढ़ा बाज़ है, जो झपट्‌टा मारकर दिलों की नौजवानी को पंजों में जकड़ लेता है और नोंच-नोंचकर उसका माँस खाता है। प्रेम कवि को खाता है और कवि प्रेम को। यह परस्पर भक्षण है। नेरूदा इस खाद्य की तलाश में असंभव सीमाओं तक जाते हैं। वह तलाश यक़ीनन उनकी कविताओं में भी दिखती है। नेरूदा महाकवि थे। सदी के सर्वश्रेष्ठ कवि। वह ‘दिलफेंक दास हृदय कुमार प्रेमोपाध्याय’ भी थे।”

नेरूदा की कविताओं का हिन्दी में भी अनुवाद हुआ। अनुवादकों में मंगलेश डबराल,अशोक पांडे, प्रतिभा उपाध्याय,उज्ज्वल भट्टाचार्य,राधाकृष्ण पांडेय,रेयाज उल हक,संदीप कुमार प्रमुख है।

आज नेरूदा का जन्मदिन है ।
प्रस्तुत है नेरूदा की कुछ महान काव्य पंक्तियां:-

“मुझे पसंद है तुम्हारे वास्ते निश्चेष्ट हो पड़े रहना।”

“उसने प्रेम किया मुझे और कभी कभी मैंने भी प्रेम किया उसको
कोई कैसे प्रेम नही कर सकता था उसकी महान और ठहरी हुई आँखों को।”

“ताकि तुम मुझे सुन सको
मेरे शब्द
कभी-कभी झीने हो जाते हैंं
समुन्द्र तट पर बतखों के रास्तों सरीखे”

“मैं चाहता हूँ–
तुम्हारे साथ वह करना
जो वसंत करता है चेरी के पेड़ों के साथ”

“कौन है सबसे ज़्यादा बदनसीब,जो इन्तज़ार करता है
या जिसने नही किया कभी किसी का इन्तज़ार”

“तुम्हारे चेहरे पर नहीं ठहरती मेरी नजर
तब मैं तुम्हारे पांवों की जानिब देखता हूँ

मैं जानता हूँ ये तुम्हें सहारा देते हैं
इन्हीं के सहारे तो है
तुम्हारा हल्का बदन

ओ मेरी नन्ही मीनार
लेकिन मुझे तुम्हारे पांवों से प्यार है
क्योंकि उन्होंने नापी तमाम धरती,
हवाओं और सागरों को पार किया
तब तक, जब तक
तलाश नहीं लिया मुझे।”

“आज की रात लिख सकता हूँ बेहद दर्द भरी पंक्तियाँ।
सोचते हुए कि वो मेरी नहीं, कि मैंने उसे खो दिया।

इस बेशुमार रात को सुनते हुए, बेशुमार उसके बिना।
और मेरे ज़ेहन में कविता आती है घास पर टपकती ओस की तरह”

“आप फूलों को कुचल सकते हो लेकिन बसंत को आने से नहीं रोक सकते। “

नेरूदा ने बच्चों के लिए भी नन्ही कविताएँ लिखी। बच्चों की रंगीन कल्पनाएँ और सवालों को लेकर लिखी गई ये किताब “सवालों की किताब” नाम से लोकप्रिय हुई।
__________________________
◆ विजय राही
संदर्भ ग्रंथ सूची:-(फोटो-परिचय गूगल से साभार)
सवालों की किताब(अनुवाद – रेयाज उल हक)
बीस प्रेम कविताएँ और उदासी का एक गीत
(अनुवाद-अशोक पांडे)
जब मैं जड़ों के बीच रहता हूँ(अनुवाद-राधाकृष्ण पांडेय)

पाब्लो नेरुदा

लेखक: Vijay Rahi

विजय राही ग्रामपोस्ट-बिलौना कला तहसील-लालसोट जिला-दौसा(राजस्थान) पिनकोड-303503 पेशे से सरकारी शिक्षक है। कुछ कविताएँँ हंस, मधुमती,दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका,डेली न्यूज, राष्ट्रदूत में छपी। सम्मान- दैनिक भास्कर का युवा प्रतिभा खोज प्रोत्साहन पुरस्कार -2018 क़लमकार मंच का राष्ट्रीय कविता पुरस्कार(द्वितीय)-2019 मो.नं.-9929475744 Email-vjbilona532@gmail.com

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