भैंरोंघाट से | “तेरी दो टकिया री नोकरी..”

भैंरोंघाट से—” तेरी दो टकिया री नोकरी..”
आज सावन का पहला दिन है और वो भी सूखा-सूखा गुजरने वाला है ..! सोचो..कि पहला दिन ही जब दगा दे रहा है तो आगे का संवत कैसा होगा ..? किसान – धरती और विरहन इसे अच्छा शगुन नहीं मानते । जहाँ जरूरत है वहाँ ना बरस कर वहाँ टपक रहा है जहाँ लोग बाढ़ से त्रस्त हैं ।
हिंदी संवत के दो महीने — सावन और फागुन आर्थिक ,सामाजिक ,सांस्कृतिक के साथ-साथ मिलन और विछोह बतौर बहुत महत्वपूर्ण माने जाते हैं । दोनों ही मस्त महीना के रूप में प्रसिद्ध हैं ।
सावन को लेकर बहुत सारे फिल्मी गीत लिखे गये हैं । भैयादूज को लेकर बहुत सारे गीत हैं ।आप आराम से इन्हें याद कीजिये । पानी में आग सावन ही लगाता है । ये हुश्न-इश्क और सावन की झड़ी का ही करिश्मा है । सावन के झूले भी पिया को बुलाते रहे हैं । राखी की पुकार भाई तक पहुँचती ही है ।
विरहन की तड़फ देखकर कोयल कूकती है ।पपीहरा पीउ-पीउ कर चिढ़ाता रहता है । और विरहन कह उठती है कि– आग लगे ऐसी दो रुपल्ली की नोकरी में..! ये सावन का ही तो कमाल है । किसी अन्य महीने में ये चमत्कार नहीं होता ।
फागुन और सावन दोनों हरे मौसम हैं । ” हरिया ” ने के मौसम हैं ।आप ना मानो तो धरती से पूछ लो । जो धारण करती है उससे पूछ लो..!
एक से एक सुरीले गीत हैं सावन को लेकर ।वैसे भी सावन सीधा-सीधा नहीं आता । वो शराबी की तरह झूम कर आता है ।और जब झूम कर आता है तो झूम-झूम कर बरसता है ।
किसी विरहन से पूछो तो वो यही कहेगी–” पानी नहीं आग बरसती है सावन में …! ”
जो मिलन करा दे वो सावन नहीं है ..। सावन तो तरसाता है । मिलन का मौसम तो फागुन है ।

जाने कहाँ जाके बरसेगा वैरी बदरा
हुक उठी मोहे बह गया कजरा ।

शगुन बिचारे मैंने काग उड़ाये
नानाविधि सखी जाल बिछाये
कोयल कूकी बोला पपीहरा
सावन आया पिऊ ना आये

झूंठे बामन जाली हैं पतरा
हुक उठी मोहे बह गया कजरा ।

भैरोंघाट से – चरण सिंह पथिक

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