मैं बच्चों को सिखाऊँगा

‘कविता’

मैं
अपने बच्चों को
सिखाऊँगा-
आम के ठीक बगल में
नीम का पौधा लगाना..;
ताकि बना रहे,
जीवन में…;
मिठास और कड़वाहट का
आवश्यक सन्तुलन…!

मैं
अपने बच्चों को
गुलाब का पौधा लगाना
सिखाऊँगा-
ताकि फूल चुनते समय
जब काँटों से छिल जायें,
उनकी कलाइयाँ..;तो..
गुलाब का रंग
और चटख़ हो जाये..!

मैं
अपने बच्चों को
अन्तर करना बताऊँगा-
केंचुआ और जोंक में..!
चूहा,छछून्दर और साँप में..!
कोयल और गिद्ध में..!

मैं उन्हें बताऊँगा-
चिड़ियाँ
गातीं ही नहीं;
रोतीं भी हैं..!

मैं
अपने बच्चों को सिखाऊँगा-
पत्थरों को
नाख़ून से चीरकर..
बालू निचोड़कर…
अपनी प्यास बुझाना..!

मैं उन्हें
अँधेरे से अभ्यस्त रहना
सिखाऊँगा..!

मैं
अपने बच्चों को
अर्थ समझाऊँगा-
सियारों के चिल्लाने का..!
बिल्लियों के बिसूरने का..!
कुत्तों के रोने का..!

मैं उन्हें बताऊँगा-
रामराज्य
केवल कहने से
नहीं आता है..!

मैं
अपने बच्चों को
यह नहीं समझाऊँगा-
शराब क्यों नहीं पीनी चाहिए..!

मैं उन्हें
पानी और दूध की
अर्थवत्ता का परिचय दूँगा..!

मैं कहूँगा-
तर्क
परिवार-नियोजन..और..
यौन-शिक्षा पर नहीं..;
ब्रह्मचर्य पर होना चाहिए..!

मैं
अपने बच्चों को बताऊँगा-
पानी के साथ-साथ
थोड़ी-सी आग पीना..!

पूरी चेतना के साथ
आँसुओं के रंग पहचानना..!

मैं
अपने बच्चों से बताऊँगा-
कुछ तो
अन्तर होता ही है…;
तितली के पंखों..और..
चमगादड़ की फड़फड़ाहट में..!

कुछ तो
अन्तर होता ही है..
इन्द्रधनुष के आभासी रंगों..और..
पैरों की फटी बिवाइयों में..!

मैं
अपने बच्चों को
सबसे पहले
प्रेम करना सिखाऊँगा..!

©धर्मेन्द्र मौर्य ‘अकिञ्चन’

Photo- amar dalpura

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