भैंरोंघाट से–” गली-गली बात चली “

जहाँ में रौनकों की क्या कमी है
मगर तेरी गली तेरी गली है ।
राजेश रेड्डी

कितने ही सुंदर और चौड़े राजपथ या जनपथ बनवा लीजिये ।बात तो गली-गली ही चलेगी । राजपथ या जनपथ पर कोई बात चली हो तो आप बता सकते हैं । जीवन में गलियों का महत्व दिलजलों से और क्रिकेट के मैदान में गली में खड़े फील्डर से ज्यादा कोई नहीं जानता।गली मिलन और विछोह का अनुपम स्थान है । यूँ बिना गली के हिंदी साहित्य ,हिंदी सिनेमा के गीत, क्रिकेट, राजनीती सब सूने हैं ।
दिल गलियों में ही टूटता है और दीवाना गाने लगता है–‘ तेरी गलियों में ना रखेंगे कदम, आज के बाद…’
‘ ये गलियां ,ये चौबारा….’
‘ बाबुल की गलियां…’
‘ मेरी गली आ जाना..
अपने वतन की गलियां कौन भुला सकता है..!!
गली का हर मोड़ याद रखने काबिल होता है ।
दीवानी सलीम की गलियां छोड़कर अपने दीवाने के पास दौड़ी चली जाती है ।चाचा गालिब से भी कहाँ दिल्ली की गलियों का मोह छूट पाया..!!
कुशल से कुशल बल्लेबाज भी आखिर गली में पकड़ा जाता है । राजनीती में भी नाजायज काम या असंवैधानिक काम के लिये सत्ता पक्ष गली निकाल लेता है ।
हद तो शायर लोग करते हैं जो — चाँद को गली में निकाल देते हैं । गली में आज चाँद निकला । चंद्रयान-2 गली में उतरेगा..। चाँद उसे वहीं मिलेगा ।
हनुमान जी भी सुरसा के बढ़ते आकार से बचने के लिए सुरसा के कान की गली से निकल लेते हैं ।
पुराने कवियों ने आज के दीवानों के साथ इंसाफ नहीं किया ।उन्होंने लिख दिया कि—” प्रेम गली अति सांकरी जामे दो न समाय ….” बंधु प्रेम की गली चौड़ी और नफरत की सड़क संकरी होनी चाहिये।
आज का प्रेम तो सिक्स लाइन मांगता है । फोर लाइन से भी काम नहीं चलता । वक्त का तकाजा है कि –आधुनिक कवि इस लाइन को बदल डालें ।ताकि बेचारे आशिक एक्सप्रेस वे वाला तेज तर्रार प्रेम बिना टोल-टैक्स और ब्रेकर के कर सकें ।
गली से गुजरता हुआ आदमी मुड़-मुड़ के देखता है ।क्या पता वो गली के मोड़ पर एक सूने दरवाजे पर नजर आ जाये..! अब चिढ़ कर कभी ये मत गाइये कि–” जिस गली में तेरा घर ना हो बालमा , उस गली से हमें अब गुजरना नहीं…!
इसमें उस बेचारी गली का क्या दोष..!
गलियों के नाम भी अजीब होतें हैं ।आप अपने शहर की गलियों के नाम याद कर सकते हैं । और याद करते – करते प्रेम गली दांये-बांये मुड़कर पहुँच जाइये ।वहाँ कृष्ण -पक्ष में भी चाँद नजर आ जायेगा । बस ध्यान रखना कि गली में कैच मत हो जाना ।
वक्त कह रहा है कि अब मुझे भी पतली गली से जिसे राजनीति में चोर गली कहते हैं से निकल जाना चाहिये ।
बेहतर है कि आप भी–” तू महलों की रानी , मैं गलियों का राजा …..” गाते हुए ” गली का आखरी मकान ” तलाश ही लीजिये ।

चरणसिंह पथिक

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