प्रेमचन्द | स्मृति

कलम के सिपाही और कलम के मज़दूर मुंशी प्रेमचन्द की लोककल्याणार्थ समाजोपयोगी साहित्य-साधना को शत शत नमन!

“मुल्क को तालीम की उससे कहीं ज्यादा ज़रूरत है जितनी फौज की। मैं चाहता हूँ कि ऊँची से ऊँची तालीम सबके लिए मुफ्त हो ताकि ग़रीब से ग़रीब आदमी भी ऊँची से ऊँची लियाक़त हासिल कर सके और ऊँचे से ऊँचा ओहदा हासिल कर सके। युनिवर्सिटी के दरवाजे मैं सबके लिए खुला रखना चाहता हूँ। सारा खर्च गवर्नमेंट पर पड़ना चाहिए”।

– प्रेमचंद (कर्मभूमि)

“जो शिक्षा-प्रणाली लड़के-लड़कियों को सामाजिक बुराई या अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ना नहीं सिखाती, उस शिक्षा-प्रणाली में ज़रूर कोई न कोई बुनियादी खराबी है।”
– मुंशी प्रेमचंद

“पुरुषों में थोड़ी-सी पशुता होती है, जिसे वह इरादा करके भी हटा नहीं सकता। वही पशुता उसे पुरुष बनाती है। विकास के क्रम में वह स्त्री से पीछे है। जिस दिन वह पूर्ण विकास को पहुंचेगा, वह भी स्त्री हो जाएगा। वात्सल्य, स्नेह, कोमलता, दया, इन्हीं आधारों पर यह सृष्टि थमी हुई है, और ये स्त्रियों के गुण हैं।
– प्रेमचंद (कर्मभूमि)

“लोग कहते हैं आंदोलन, प्रदर्शन और जुलूस निकालने से क्या होता है…? इससे यह सिद्ध होता है कि हम जीवित हैं, अटल हैं और मैदान से हटे नहीं हैं…! हमें अपने हार न मानने वाले स्वाभिमान का प्रमाण देना था…! हमें यह दिखाना है कि हम गोलियों और अत्याचारों से भयभीत होकर अपने लक्ष्य से हटने वाले नहीं और हम उस व्यवस्था का अंत करके रहेंगे, जिसका आधार स्वार्थीपन और खून पर है…!”
– प्रेमचंद

“साम्प्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई दिया करती है। उसे अपने असली रूप में निकलने में शायद लज्जा आती है, इसलिए वह उस गधे की भांति, जो सिंह की खाल ओढ़कर जंगल में जानवरों पर रौब जमाता फिरता था, संस्कृति का खोल ओढ़कर आती है।”
– प्रेमचंद

एक उत्तर दें

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s