मुश्ताक़ | असद ज़ैदी

मुश्ताक़

मुश्ताक़ से मेरा साथ स्कूल के दिनों से ही था। हम सहपाठी थे। वह पढ़ने में तेज़ था। घर भी अाया जाया करता। वह पास के देहात के कईं गाँवों में बसी लुहार बिरादरी का एक मेधावी लड़का था। उसके कुनबे में लोहे अौर टीन के संदूक़, बक्से,बड़े बड़े ड्रम अौर बुख़ारी बनाने का काम चला आता था। वह मेरा तो पक्का दोस्त था ही, मेरे पिता का अौर कुछ ही अरसे में हमारे घर के सभी अफ़राद का प्रिय बन गया। हमारे घराने से उसका परिचय एक अलग तरह की तहज़ीब, सलाम-दुआ, अदब-आदाब और बोलचाल के क़रीने से परिचय था। यह दुनिया उसे बहुत भायी। हमारे घर में उसे जो मुहब्बत मिली उसका शुक्रिया अदा करने कभी कभी उसके बाप, माँ अौर चचा मेरे परिवार से मिलने अाया करते।

मैं घर पर न होता तो वह अम्मा को सलाम करके सीधा जाकर अब्बा के पास बैठ जाता। पिता की बताई बहुत सी काम की बातें मुझे मुश्ताक़ ही से पता चलतीं। पिता कहा करते थे यह लड़का अागे जाएगा।

यूँ तो मेरे पिता समाज, सियासत और दुनिया-जहान के दूसरे मामलों की बारीकियों को समझते थे, पर कुछ मामलों में मोटी नज़र से काम लेते थे। कहा करते थे कि सैयदों की क़ौम ज़वाल पर (पतन की ओर अग्रसर) है, देखना लुहार, जुलाहे, कुंजड़े अौर मेव ही अब आगे बढ़ेंगे। उनके बच्चों में मेहनत का माद्दा है, ख़ुदा जाने कहाँ से उनमें ऐसी ज़हानत आ गई है! क़साइयों की क़ौम कितनी तरक़्क़ी की राह पर है ही, सियासत में भी आगे जाएगी। पता नहीं पिता की इन बातों के पीछे किसी क़िस्म की हताशा थी, या सामाजिक न्याय का नया जज़्बा! बहुत बाद में अपने पिता की कुछ बात चली तो एक कामरेड ने समझाया कि साथी, इसी को कहते हैं कुत्सित समाजशास्त्र!

अम्मा कभी कभी अब्बा से कहतीं, सभी कुछ उस मुश्ताक़ ही को सिखाए देते हो, कुछ अपने बेटे को भी पास बिठाकर पढ़ा दिया करॊ! पिता कहते, कैसे पढ़ाऊँ? उसकी कुछ ख़बर तो हो! दूर दूर भागा फिरता है, नज़र आए तो बुलाऊँ! बाप-बेटों के बीच की इन अादिम ख़ामोशियों का मामला दुनिया में कोई माँ कभी सुलझा सकी होती तो मेरी माँ भी सुलझा लेती। बहरहाल!

मुश्ताक़ अौर मैं कॉलेज भी साथ साथ गए, लेकिन वह गणित अौर भौतिकी का छात्र था अौर मैं आर्ट्स का। कॉलेज के बाद उसने कई अौर परीक्षाएँ पास कीं। कहीं नौकरी न मिली तो हारकर मौलवी का इम्तिहान दिया अौर किसी मदरसे में मुदर्रिस होकर जयपुर चला गया। वहीं पास की एक मस्जिद में इमामत भी करता। मेरे पिता इस सूरते-हाल से शायद मायूस हुए। एक दफ़े वह पिता से मिलने अाया तो उन्होंने उससे कहा, भई मुश्ताक़ इसे अपनी बदक़िस्मती न समझना। इन चीज़ों में भी कोई मस्लेहत होती है। अल्लाह ने चाहा तो एक दिन बड़े अालिम-फ़ाज़िलों में तुम्हारा शुमार होगा।

मुश्ताक़ मुदर्रिसी अौर इमामत के साथ मुहल्ले और वार्ड स्तर की राजनीति में भी दिलचस्पी लेने लगा। इसकी एक वजह उसने यह बताई कि सियासी दलों या नेताअों को जब मुसलमान अवाम तक कोई बात पहुँचानी होती तो वे सीधे किसी ‘मौलाना’, मुदर्रिस या मस्जिद के इमाम को ढूँढ़ने अाते हैं। गाँधीजी के ज़माने से ही यह रीत चली अाती है। मुश्ताक़ के यह कहने पर कि अाप लोग मुहल्ले के लोगों से बराहे-रास्त बात कीजिए, बैठक बुलाइए, कुछ मेल-जोल रखिए, वे कहते, मौलाना साहब, अाप से बेहतर मुसलमान भाइयों की तर्जुमानी कौन कर सकता है! हम सोच समझकर ही अापके पास अाए हैं। यह सुनकर मुझे पहली दफ़े यह समझ में अाया कि “मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी” मुहावरा मुसलमानों के बीच क्यों इतना ज़्यादा प्रचलित है।

मेरे पिता नहीं रहे तो मुश्ताक़ घर अाया। मेरे साथ क़ब्रिस्तान गया, फ़ातिहा पढ़ी अौर काफ़ी देर तक रोता रहा। जाते वक़्त अम्मा के पास गया। कहा, अम्मा जाता हूँ। अम्मा बोली, जाओ, पर अपने इस घर को फ़रामोश न कर देना। तीज-त्यौहार, ईद-बक़रीद, मुहर्रम वग़ैरा पे सूरत दिखा जाया करना! मुश्ताक़ ने इसे हुक्म माना अौर हमेशा इसकी तामील की। जब मैं जयपुर रहने लगा तो महीने-दो महीने में एक बार मिलने ज़रूर अाता। अक्सर अपने घर की ख़बरें उसी से मिला करतीं। घर से मेरा फ़ासला बढ़ता जाता था। ये मामलात ऐसे हैं कि इन्हें समझाना, बल्कि ख़ुद समझना मुश्किल काम है। मैं ख़ुद नहीं जानता। लेकिन मुझे यह जानकर तसल्ली होती थी कि मुश्ताक़ ने किसी हद तक मेरी जगह ले ली है।

पिता के जाने अौर फिर सात बरस बाद माँ के गुज़रने के बाद भी मुश्ताक़ का वहाँ अाना जाना कम न हुआ। अब मेरी बड़ी बहन ने उसके लिए लगभग माँ की जगह ले ली थी। यह ज़रूर था कि मैं उससे पुराने दोस्त की तरह बेतकल्लुफ़ी अौर बेपरवाई से बात करता रहता अौर वह मुझसे बड़े अदब से बोलता, कि मैं अब उसके उस्ताद का जाँनशीन अौर बड़ा बेटा था। वह मुझे आप कहता अौर मैं उससे तुम, तू या अरे यार कहकर मुख़ातिब होता। मैं कभी कभी झल्लाता, यह भी कहता कि मैं अपने बाप की बिगड़ी हुई अौलाद हूँ, ऊपर से बाएँ बाज़ू का ना-अहल, नाकारा शख़्स हूँ, तुम यह अदब-अादाब, श्रद्धा-भक्ति मुझपे न आज़माअो! लेकिन मुश्ताक़ ने अपनी रविश न छोड़ी। हाँ, मेरे छोटे भाई से वह पूर्ववत बेतकल्लुफ़ी अौर याराना अंदाज़ से बात करता। मेरी बजाय अब उन्हीं के दरमियान राज़ की बातें हुअा करतीं।

फिर मैं दिल्ली अा बसा। हर महीने-दो महीने उसका फ़ोन अा जाता। रात को इशाँ की नमाज़ के बाद जब फ़ुरसत मिलती फ़ोन करता अौर पहले यह पूछता कि कहीं मेरी नींद में ख़लल तो नहीं डाल रहा! मैं कहता कि नहीं नहीं, जागा हुअा हूँ पर तुम्हारी बातें सुनकर नींद तो अा ही जाएगी। वह कहता, वल्लाह, ये अाप कैसी बातें करते हैं… कहिए तो बाद में फ़ोन करूँ? एक दफ़े मैंने कहा, अरे मुश्ताक़, तू मुझे अौर बेज़ार न कर! मुश्ताक़ कुछ देर चुप हुअा, फिर बोला—वल्लाह, मिर्ज़ा भी क्या शै थे! (हम हैं मुश्ताक़ अौर वो बेज़ार/या इलाही ये माजरा क्या है—ग़ालिब।) सुनकर मुझे अजीब सी तसल्ली हुई। फिर उसने झिझकते हुए बताया कि उसका निकाह जयपुर देहात के एक मामूली घर की ख़ातून से हो गया है। मैंने मुबारकबाद दी अौर पूछा, ख़ातून मिज़ाज से कैसी हैं? बोला, अापकी तशरीफ़े-अावरी होगी तो ख़ुद जान लीजिएगा।

वक़्त के साथ मुश्ताक़ अपने रोज़मर्रा के व्यवहार में अपने परिवार की ब्रज-मिश्रित देहाती उर्दू की जगह ढूँढारी अौर राजस्थानी क़िस्म की हिन्दी बोलने लगा। लेकिन मुझसे नहीं। मुझसे वह हमेशा मेरे पिता अौर मेरे घर वाली साफ़ अौर शुस्ता उर्दू में ही गुफ़्तगू करता। मेरे भाई का कहना है कि अाज तक सिर्फ़ मुझी से वह ख़ालिस उर्दू बोलता है। मेरे लिए भले ही वह घर की ज़बान हो, उसके लिए वह उसके सपनों की ज़बान थी। मेरे बग़ैर उसका यह कल्पनालोक पूरा न होता था।

कई बरस के बाद मैं दो रोज़ के लिए जयपुर गया। अचानक ख़याल अाया कि मैंने मुश्ताक़ को बताया नहीं अौर बिना मिले चला जा रहा हूँ। मैंने रास्ता बदला अौर उसके घर पर दस्तक दी। मुश्ताक़ घर पर था नहीं, उसकी बीवी ने दरवाज़े से झाँका, अौर पता नहीं कैसे मुझे पहचान लिया। वह बड़ी सहजता अौर अदब से मुझसे अाकर लिपट गई। उसका नाम बतूल था। देखते ही पता चलता था कि वह एक अात्मविश्वासी, मेहनती, ख़ुशमिज़ाज अौर पुरख़ुलूस अौरत है। वह मेरे क़स्बे में जाकर घर के सभी लोगों से मिल अाई थी अौर अपने रिश्ते बना अाई थी—मेरी बहनें, मेरा भाई अौर भाभी अब उसकी बड़ी ननद, छोटी ननद, भाभी, देवर इत्यादि हैं। उसे उनके बच्चों के नाम भी पता थे। मैं उसका जेठ हुअा। (अाह, बस यही संबोधन सुनना बाक़ी रहा था!) वह मेरे कुनबे के गुज़र चुके लोगों के बारे में ऐसे बात करती थी जैसे उसने उन्हें ज़िन्दा अौर चलते फिरते देखा हो!

उसी से मुझे पता चला कि मुश्ताक़ अब नगर निगम में अपने इलाक़े से पार्षद है।

जब तक मुश्ताक़ घर में दाख़िल हुअा मैं अचार के साथ दो तिकोने पराँठे खा चुका था अौर चाय पीने में लगा था। मुझे देखकर मुश्ताक़ ठिठका रह गया, फिर उसकी आँखें भर आईं और अपने दोनों हाथ आगे करके वह मुसाफ़ा करने के लिए बढ़ा जैसे कि उसके पीर-मुर्शिद घर अाए हैं। मैंने उसे गले लगाकर कहा, मुश्ताक़, अब तुम्हारी शादी हो गई है, तुम्हें बतूल जैसी माक़ूल ख़ातून मिल गई है। माशाअल्लाह अब पार्षद हो। बस, तुम नॉर्मल इन्सान बन जाओ! मुश्ताक़ ने कहा—जी!

बतूल ने कहा—तुम हँसोगे तो नहीं, पहले-पहले, जब हम नई नई ब्याह कै आई थीं, हमें भी लगै कि यह हमारे मियाँ रात-रात को फ़ोन करके किसके साथ जिन्नाती सी बोली बोला करैं!

जिन्नाती बोली!

मैंने मुश्ताक़ की तरफ़ देखा, मुश्ताक़ ने मेरी तरफ़।

मैंने कहा, अल्लाह तुम्हारा भला करे बतूल, तुमने अाज उर्दू ज़बान पे फ़ातिहा पढ़ दी! वह हँसने लगी।

एक उत्तर दें

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s