ग्रामीण जीवन, प्रकृति और मनोविज्ञान को साथ लेकर चलने वाली कहानियाँ | राजेन्द्रदान देथा

कहानी संग्रह | मैं बीड़ी पीकर झूठ नहीं बोलता |चरण सिंह पथिक
कहानी संग्रह | मैं बीड़ी पीकर झूठ नहीं बोलता |चरण सिंह पथिक
कहानी संग्रह | मैं बीड़ी पीकर झूठ नहीं बोलता |चरण सिंह पथिक

अपने समकालीन पर कुछ लिखना आज एक खतरा सा है। गुटबाजी के इस दौर में कौन, कहाँ, क्या कह जाए, कुछ पता नहीं! पथिक इस से काफी अलग हैं। और उनके साथ बैठना गांव में बैठना एक जैसा है। वे समकालीन कहानी में बेशक बड़ा स्थान डिजर्व करते है।

राजेन्द्र यादव अपनी एक संपादित पुस्तक स्वतंत्रता के बाद की सर्वश्रेष्ठ कहानियों किताब “यह दुनिया समानांतर” में कहानी को लेकर लिखते है कि हिंदी की आज की कहानी को प्रतीकों ने निश्चय ही सार्थक कलात्मक और सांकेतिकता प्रदान की है।

कथानक को यथार्थ गढना कथाकार के सामने महती चुनौती है। कुछ ऐसा ही यथार्थ गढ़ा गया है, चरण सिंह पथिक की कहानियों में। वे राजस्थान के करौली जिले के, रौंसी गांव में रहते हैं। पेशे से शिक्षक और मन से ग्रामीण जीवन के चितेरे।

कहानियां पाठक को इसलिए भी पसंद आयी हो कि कहीं पाठक ही गांव का हो। कहानियों में एक बात कॉमन देखी गई कि सभी कहानियों में ग्रामीण आंचल को खूबसूरती से उकेरा गया। दरअसल यह उनका गाँव के प्रति प्यार है।

‘मैं बीड़ी पीकर झूठ नहीं बोलता’ उनका नया कहानी संग्रह है। कलमकार मंच ने इसे प्रकाशित किया है। कुल नौ कहानियों में कथाकार ने सम्पूर्ण रिश्ते समेटे है। प्रकृति को दर्ज किया है। उसे बचाए जाने का जतन किया है। गांव की सौंधी महक को खूबसूरती से नवाजा है,पुराने समय को याद किया है। कहीं ऐसा भी नहीं है कि वे रूढ़ियों को तोड़ते नज़र नहीं आते।

कहानी ‘ठंडी गदूली’ में कहानी का अंत एक भयानक पंक्ति से होता है -“गरीब की गूदली तो हमेशा से ही ठंडी रहती आई है”! यह हमारे समय का ही नहीं सदियों से सापेक्ष गति बनाए साथ दौड़ रहा एक भयानक सच है। हमने इस वर्ग को कभी देखा नहीं।पोथियों खूब लिखी गई, जतन अपना सम्मान बनाने के लिए, मंच के लिए।

कथाकार के सामने अपने समय में पर्यावरण की चिंता है। बढ़ते वनोन्मूलन की चिंता है। प्रकृति के साथ अपना जीवन बिताया है कथाकार ने। कहानी ‘पीपल के फूल’ और ‘जलफोडवा’ में यह चिंता की लकीरें, पाठक को वर्तमान संदर्भ में अनेकों सीख एक साथ देती है।

‘वह अब भी नंगा है’ कहानी पढ़ते वक़्त राजस्थानी के अद्भुत कथाकार रामस्वरूप किसान की कहानी ‘तीखी धार’ की कुछ पंक्तियाँ याद आ गयी वे लिखते है कि “तंगी ज़द मज़ाक पर ऊतरै तो धूड में मुट्ठी भरा देवै, बा इसी कर द्यै के खा नी कुत्ता खीर। समझ ई कोनी आवै कै हांसै ‘क रोवै।गरीबी कदै कदै लांठै कवि री भांत बा अभिधा में दुख नीं देय’ र व्यंजना में द्यै। कहानी में बालक तीन साल तक करीम अंकल के पास दिलासे दी हुई ड्रेस के लिए गोते खाता रहता है और एक दिन करुणा से भरकर दे भी देता है लेकिन वह किसी के द्वारा चुरा ली जाती है। मनोवैज्ञानिक रूप से लिखी कहानी का कथ्य बहुत आकर्षित करता है।

कहानी दो बहने भी स्त्री मनोविज्ञान और घर के घरेलु रिश्तों पर बुनी गई बेहतरीन कहानी है।दो सगी बहने होती है,बचपन में भी झगड़ना उनके जिम्मे होता है और संयोग से एक दिन दोनों सगे भाईयों को ब्याह दी जाती है।और फिर ससुराल में भी लड़ना बंद नहीं रहता।इसी कहानी पर विशाल भारद्वाज ने पटाखा फिल्म भी बनाई है।

यह कितना अद्भुत है कि गांव का एक कथाकार मुंबई जैसी मायानगरी में अपना स्थान रखता है, सिर्फ कहानी के बल पर,अपने प्यारे लेखन के बल पर।एक कहानी पर गजेन्द्र श्रोत्रिय ने भी हाल ही में कसाई फिल्म बनाई है।हिन्दी और रौंसी गांव के लिए ही नहीं सम्पूर्ण सूबे के लिए यह गर्व की बात है।

किताब को पढ़ने का मन शीर्षक को देखकर ही हुआ था। लेकिन ‘मैं बीड़ी पीकर झूठ नहीं बोलता’ कहानी अच्छी है। लेकिन पता नहीं क्यूं मुझे उतनी अच्छी नहीं लगी, जितनी लगनी चाहिए। फिर भी बढ़िया है। कहानी ‘दो चिड़िया’ भी रिश्तों के बुनियाद और मानव मन के विश्लेषणात्मक विषय पर बुनी गई, एक सार्थक कहानी है।

कहानी सर्पदंश का अंत पाठक को करुणा से भर देता है। किसान आत्महत्या नहीं करता, न ही उसका खेत उसे मारता है। यदि वह आत्महत्या कर रहा है तो सरकार से तंग आकर, समाज में व्याप्त होड़ रीतियों से परेशान होकर। कहानी ‘मुर्गा’ को एक बेहतरीन कहानी के रूप में रखना चाहता हूं। यह दुर्भाग्य ही है कि आज भी हर जगह यह पूछा जाता है “क्या ज़ात है भई”।

सभी कहानियाँ बढ़िया है, विशेषकर – ‘मुर्गा’, ‘दो बहने’, ‘जलफोडवा’, ‘सर्पदंश’ सबसे बेहतरीन रची गई है।

भाषा शिल्प – यह सहज भाषा का ही कमाल है कि वह पाठक को लगातार बांधे रखती है। शिल्प कथ्य सब सुन्दर। गंवई मुहावरे कृति में शानदार चमक लाते है।

मैंने लगातार कोई किताब अब तक पढ़ी है, तो वह है पोएलो कोएलो की ‘इलेवन मिनट’, ‘मंटो की कहानियां’ और रामस्वरूप ‘किसान’ की ‘हाडाखोडी’। मैं बाकी सभी किताबें रह रह कर पढ़ता हूं। उक्त किताबों में ‘मैं बीड़ी पीकर झूँठ नहीं बोलता’ भी शामिल हो गई।

चरण सिंह ‘पथिक’ को इस बेहतरीन कृति को रचने के लिए इस पाठक की तरफ से खूब बधाईयाँ।

एक उत्तर दें

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s