रेत, मिट्टी और पत्थर की बात करता हूँ | राहुल बोयल

मुल्क, जम्हूरियत और सियासत की बात नहीं करता
मैं ना ही बड़ी-बड़ी इंसानियत की बात करता हूँ
मुझे ना कुनबों और कबीलों की बात आती है
ना ताबूत में ठोंकी गयी कीलों की बात करता हूँ ।

मैं मुहब्बत की बात करता हूँ
मैं इज़्जत की बात करता हूँ
मैं पहाड़ों और टीलों की बात करता हूँ
मैं नदी और झीलों की बात करता हूँ ।

मैंने तलवार को कभी छूकर नहीं देखा
मैं ना उसकी धार की बात करता हूँ
लहू मेरा भी खौलता है मगर
मैं वीणा और सितार की बात करता हूँ।

मैं तेरी बात नहीं करता, मेरी भी नहीं करता
करता हूँ तो सिर्फ़ हमारी बात करता हूँ
मैं अक्सर ख़ामोश रहता हूँ लेकिन
तुम्हें पता होगा, मैं सारी बात करता हूँ ।

मुझे मोर, खरगोश और कबूतर पसन्द हैं
मैं मछली, घोड़े और हाथियों की बात करता हूँ
मैंने चीलों और गिद्धों को देखा है सहरा में
इसलिए मासूमियत से साथियों की बात करता हूँ।

झरने, सागर और शबनम सबकी किस्मत में नहीं
ऐसे में रेत, मिट्टी और पत्थर की बात करता हूँ
आसमान, चाँद और तारे मुझे भी ललचाते हैं
फिर भी ज़मीन पर गुज़र-बसर की बात करता हूँ।

बहुत कुछ है जो सँवर सकता है लेकिन
फिलहाल मैं बराबरी की बात करता हूँ
मैं तो बस सुन सकता हूँ भीतर की आवाज़
नहीं राम मन्दिर और बाबरी की बात करता हूँ।

मैं सुलझा नहीं सकता बंगाल-कश्मीर का मुद्दा
मैं पंडित, मोमिन जैसी खण्डित बात नहीं करता
मैं बच्चा नहीं पर बंदूक, बम और तोप से डरता हूँ
इनकी खू़ूबियों की महिमामण्डित बात नहीं करता ।

मैं चाहतों और राहतों के शऊर चाहता हूँ
मैं ज़िन्दगी और उसके सलीके की बात करता हूँ
मेरी बात के नहीं कोई मानी किसी निगाह में
मैं फिर भी अमन लाने के तरीके की बात करता हूँ।

मुल्क, जम्हूरियत और सियासत की बात से पहले
चलो एक दफ़ा हम घर-बार की बात कर लें
मैं छोड़ देता हूँ चिड़ियों, पेड़ों और पर्वतों की बातें
आज मिल बैठकर परिवार की बात कर लें ।

राहुल बोयल के प्रथम संग्रह ‘समय की नदी पर पुल नहीं होता’ से एक कविता

भाषा रिसर्च एंड पब्लिकेशन सेंटर के पेज से साभार

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