दुब्यारी | बलराम कांवट

मुंह अंधेरे ही –
जब मुर्गे ने बांग दी
धरती की गूदड़ी पर ऊंघता सूरज
ओढ़े हुए –
काले पर्वत की चादर को
थोड़ा कसमसाया ।
वहीं पर्वत के चरणरज में सहज लेती –
एक निराली बस्ती
जिसके किनोर में सटे कच्चे घर की –
कच्ची दहलीज़ निकली
आषाढ़ के मौसम में पकी हुई
कैरी के जैसी –
एक पकी हुई – दुब्यारी

मैले आकाश के आँचल में
सर्दी से ठिठुरे हुए –
बेरों के जैसे
कुलबुलाते हुए –
कोमल तारों को चूमकर
अपने नन्हें नन्हें फलों को
इस कदर दुबकाते हुए जैसे –
पपीते के पेड़ों में आए –
पपीतों पर नज़र लग जाने के डर से
चारों ओर कपड़े लगाकर
दुबका दिए जाएँ …
वह दुब्यारी –
पठार सी पीठ पर पल्ली की
सफ़ेद परत डाले
हाथ में लिए हुए खुरपी
मनः क्षेत्र में रात्री की नीरवता लिए
हर खेत के माथे पर बीनते हुए
पके हुए सफ़ेद बालों को
अंचल आधार से गाते हुए –
अपनी माटी के लोकगीत

वह चल निकली !
पाठ का प्रत्येक चींचड़ा
गोखरू
और औंगा के छिरंगे
सौम्य ओस की चंद बूंदों के
निर्मल स्पर्श से –
परिवर्तित होते गए
धमासे के लाल गुलाबी
कुआँड़ के नीले
और कना के पीले फूल

चंद्रवार से चमकती रहो
प्रति पट्टी प्रति डोडी
प्रति फूल …

कुछ अदाशिशियों ने यद्यपि –
छेदा !!!
उस मतवाली का पदफूल
मगर –
रक्त बूंद को अमृत बूंद कहकर –
वह चलती गयी –
ह्रदय हस्त से बटोरती गयी –
‘जीवन कंद’

इस बार मुर्गे ने –
फिर से बांग दी …
झड़ियों के बीच से
दौड़ कर –
सूरज निकला
अब तक –
पूर्ण हो गयी थी
दुब्यारी की मोठ !
क्षत विक्षत मोठ को लेकर
वह उसी तरह पुनः लौटी
जिस तरह –
कल लौटी थी ।
जीवन के कंद के तिनके तिनके को समेटकर
वह लौटी –
उस सर्पिल पगडंडी के सहारे
जहां मूँदे नैनों से देखने पर –
कर्तव्य के तंतुमात्र ही
दिखाई पड़ते हैं !

बलराम कांवट, सुपरिचित कथाकर उनका एकमात्र लेकिन चर्चित उपन्यास ” मोरिला”. ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार के लिए अनुशंसित कृति है. उन्हें 2018 में रुकमणी देवी युवा साहित्यकार सम्मान से सम्मानित किया गया. मूलतः टोकसी (सवाई माधोपुर) राजस्थान के रहने है. आजकल देहली में रहते है. उनसे balramkanwat@gmail.com पर बात की जा सकती है.

“दुब्यारी | बलराम कांवट” पर एक विचार

  1. वह मर जाना चाहती है
    __________________

    कभी-कभी वो ….मर जाना चाहती है
    कभी-कभी वो ……मर भी जाती है ।
    और कभी तो ऐसा भी हो जाता है
    न तो साँस आती है, न ही निकल पाती है ।

    मरती है वो तब ही जब… मरना नहीं चाहती है
    और जब चाहती है मरना, वो मर नहीं पाती है ।
    आम बात है ऐसे मरना ….जैसे रोज़ वो मरती है
    ऐसी मौत की वो तमन्ना बिल्कुल नहीं करती है ।

    वो मरती है तब तब जब कोई उसका चरित्र घड़ता है
    वो मरती है तब भी जब उस पे कोई स्त्रीदोष मढ़ता है।

    वो मरती है तब भी जब उसको कोई रंग- रूप,
    नाप- माप, डील-डौल, चाल-ढ़ाल, नयन-नक़्श
    और ना जाने कैसी- कैसी विचित्र भाषाओं में पढ़ता है ।

    छोटी- छोटी आशंकाओं से घबरा के मर जाती है
    कभी-कभी अट्टहासों से टकरा के मर जाती है ।
    वो अपनी आशाओं के उस प्रेमी पर भी मरती है
    वो जीवन देता रहता है जब-जब वो मर जाती है ।

    मरना नहीं चाहती वो ………..
    क्षोभ में, ग्लानि में, पराजित सी, अवसादित सी,
    बंधन में, क्रन्दन में, अल्प सी, मित सी, निंदित सी ।
    मरना नहीं चाहती वो…………
    नित्य नये टुकड़ों में, अश्रुपूरित, रक्तरंजित
    नित्य नये कपड़ों में, नग्न नयनों से शापित ।

    वो मरना चाहती है पर मरने से पहले चाहती है
    विष खाऊं तो झाग न उगलूं,
    एक झटके में ही श्वास मैं उगलूं ।
    जल जाऊं तो बिना दर्द के छाले हों
    फिर एक क्षण भी ना प्राण मेरे हवाले हों ।

    ********

    बहुत अधिक की प्रक्रिया
    ___________________

    बहुत अधिक प्रेम जताना
    प्रेम से अधिक संदेह जताता है
    बहुत अधिक अनदेखी भी
    इसी प्रक्रिया में शामिल है।

    तुम मेरी नींदों को तोड़ो
    और मेरे स्वप्नों में ख़लल डालो
    या ऐसा करो
    मेरे स्वप्नों को तोड़ो
    और मेरी नींदों में ख़लल डालो
    मेरी कविताओं में मत झांको
    बहुत कुछ है, जो मेरा लगता है
    पर मेरा नहीं है
    न दर्द, न दु:ख
    जैसे मैं उठा हूँ, मेरा प्रेम भी
    इसी प्रक्रिया में शामिल है।

    मेरी कविताओं को रस्सी बनाकर
    अपने गले में मत डालो
    इनको शहद की तरह
    जीभ पर रखो
    और कण्ठ में उड़ेल लो
    यदि कोई तुम्हे कहे कि तुम
    क्रोध में और सुन्दर दिखते हो
    तो दर्पण में ज़रूर देखो
    भ्रम टूटना भी जीवन की
    इसी प्रक्रिया में शामिल है।

    बहुत अधिक क्रोध भी
    विरोध नहीं, छलावा लगता है
    बहुत अधिक खिलखिलाहट भी
    इसी प्रक्रिया में शामिल है।

    *******
    कवि परिचय-
    राहुल कुमार बोयल
    जन्म दिनांक- 23.06.1985
    जन्म स्थान- जयपहाड़ी, जिला-झुन्झुनूं( राजस्थान)
    सम्प्रति- राजस्व विभाग में कार्मिक
    पुस्तक- समय की नदी पर पुल नहीं होता (कविता संग्रह)
    नष्ट नहीं होगा प्रेम ( कविता संग्रह)
    मोबाइल नम्बर- 7726060287
    ई मेल पता- rahulzia23@gmail.com

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