छंदबद्ध काव्य में छाँदिक निपुणता ही सब कुछ नहीं है

राजस्थानी माण्ड गायन में बीच बीच में दोहे गाए जाते हैं,मुखड़े की मूल पँक्तियाँ बहुत सीमित हैं ,यह पंक्ति या इसका एक अंश टेक के रूप में भी उपयोग होता है’केसरिया बालम आओ नी
पधारो म्हारे देस ‘इस मूल पंक्ति के कई बार दोहराव के बाद ,अंतरों के रूप में कुछ दोहों से मांड गायन का विस्तार होता है । इनमें से कुछ दोहे ,दोहे के नियमों पर खरे नहीं उतरते ,लेकिन इस बात से उनकी लोकप्रियता और प्रभाव पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता । इससे यह स्पष्ट होता है कि लोक, छंद के नियमों से ज़्यादा काव्य में निहित विचार और उसके अनुभूति पक्ष की गहराई को महत्व देता है । एक उदाहरण देखिएसाजन साजन म्हे करां,साजन जीव जड़ी ।
सुरत लिखा ल्यां छूड़ले,निरखां घड़ी घड़ी ।। अर्थ-व्याख्या -नायिका कहती है कि मैं साजन के प्रेम में ,उसकी याद में ,उसके नाम को रटते रटते ,उसके हृदय में इस तरह अंकित हो गई हूं,जैसे चूड़े में नगीना जड़ा होता है,मैं बार बार चूड़े में जड़ित कांच-नगीने में अपनी ही छवि देखती रहती हूँ एवं प्रियतम को स्मरण कर प्रेम के वशीभूत हो ऐसा अनुभव करती हूं मानो उसके हृदय में अपनी छवि देख रही हूँ (यह मेरी अपनी सीमित समझ से व्याख्या है )दोष – इस दोहे के दूसरे और चौथे चरण (2-साजन जीव जड़ी/4-निरखां घड़ी घड़ी ) में 11,11 मात्राएं होनी चाहिए थी तथा अंत मे मात्रा क्रम गुरु,लघु (21)आना चाहिए था ,जबकि यहाँ मात्राएं -10,10 हो रहीं हैं और मात्रा क्रम लघु ,गुरु(12) आ रहा है ,जिसके कारण इसे दोहा नहीं कहा जा सकता । लेकिन इस दोष के होते हुए भी न जाने पिछले कितने वर्षों से इसकी लोकप्रियता में झोल नहीं आया ।
आजकल कई लोग दोहे और अन्य छंद बद्ध रचनाएं कर रहे हैं । कुछ लोग छंद की बारीकियों में तो निपुणता प्राप्त लेते हैं ,लेकिनउनकी रचनाओं में नवीनता ,विचार और मौलिकता दूर दूर तक दिखाई नहीं देती ।
हमें लोक से यह बात भी सीखनी चाहिए कि काव्य की लोकप्रियता और प्रभावशीलता के लिए छंद में पारंगत होना ही सब कुछ नहीं होता ,यदि आपके कथन में दम है तो दोषपूर्ण रचनाएं भी अमर हो सकती हैं ।

-राम नारायण हलधर

राम नारायण “हलधर”

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