“मेरी चिताणि” -रामबक्ष जाट | टिप्पणी -कृष्ण कल्पित

प्रोफ़ेसर रामबक्ष जाट की सद्य प्रकाशित कृति ‘मेरी चिताणी’ कुछ दिन पूर्व प्राप्त हुई । पुस्तक प्राप्ति के साथ ही सबसे पहले मैंने किताब का परिशिष्ट पढा, जिसमें रामबक्श ने अपने गुरुओं डॉ नामवर सिंह और डॉ मैनेजर पाण्डे पर अलग से दो लेख लिखे हैं ।

इसके बाद मैं दिल्ली चला गया । वहाँ से लौटते ही पहला काम ‘मेरी चिताणी’ को पढ़ने का किया । बहुत ही रोचक अंदाज़ से लिखी यह कृति कभी आत्मकथा लगती है तो कभी संस्मरण । कभी किताब का गद्य रेखाचित्र होने का आभास देता है तो कभी यह अपने गाँव पर लिखा रिपोर्ताज़ लगता है । जब प्रिंटलाइन देखी तो वहाँ भी किताब की विधा का कोई ज़िक़्र नहीं है ।

जो हो किताब का गद्य दिलचस्प है । यहाँ विधाओं का विलोपन है । यह किताब जितनी नागौर जिले के एक छोटे-से गाँव चिताणी के बारे में हैं उतनी ही रामबक्ष के बारे में । यह किताब बताती है कि कैसे एक किसान परिवार का बच्चा पढ़ने के लिए संघर्ष करता है और एक दिन पिछड़ी पर दबंग जाति का यह लड़का आगे चलकर तिवारियों, मिश्राओं, चतुर्वेदियों, द्विवेदियों, सिंहों और श्रीवासत्वों के जाल को काटकर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा विभाग का अध्यक्ष बनता है ।

ज़रूर इसमें रामबक्ष के गुरुओं नामवर सिंह और मैनेजर पाण्डे का किंचित योगदान रहा हो जिनका शिष्यत्व रामबक्ष को अपने शुरुआती दिनों में जोधपुर विश्वविद्यालय में ही प्राप्त हो गया था । नामवर सिंह ही रामबक्ष को जोधपुर से जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय दिल्ली ले गये । पीएचडी कराने, जहां उन्होंने नामवरजी के साथ ‘प्रेमचंद और भारतीय किसान’ विषय पर शोध सम्पन्न किया । यह पुस्तक अब हिंदी आलोचना की एक ज़रूरी पुस्तक है ।

जो लोग नामवरजी पर ठाकुरवाद या जातपांत का आरोप लगाते हैं उनको देखना चाहिए कि नामवरजी जब जोधपुर से दिल्ली आते हैं तो अपने साथ किसी तेजसिंह जोधा को नहीं एक प्रतिभाशाली जाट बच्चे को साथ लाते हैं । ठाकुरों और जाटों में राजस्थान में पारंपरिक दुश्मनी चली आती है । सामंतों और किसानों की दुश्मनी कालांतर में ठाकुर जाट में बदल गई, जिसका दिलचस्प वर्णन रामबक्ष ने इस किताब में किया है । नामवर सिंह जहाँ के थे वहाँ जाट जाति नहीं होती, इससे मिलती-जुलती भूमिहार जाति ज़रूर होती है ।

‘मेरी चिताणी’ एक पठनीय पुस्तक है । राजस्थान के एक सुदूर गाँव, वहाँ का रहन-सहन, जीवन-संघर्ष, भूगोल, अकाल, अभाव इत्यादि का मार्मिक वर्णन पुस्तक में हुआ है । मैं भी रामबक्षजी के पड़ोस के जिले का हूँ वह भी जाटों का इलाका है और इसलिए मुझे भी कई लोग जाट समझते हैं । मेरे लिए भी इस किताब में बहुत-सी नई रोशनी है । कुछ कथाओं, किस्सों, संस्मरणों, कहावतों ने भी किताब को पठनीय और दिलचस्प बना दिया है । अपनी माँ और पिता के बारे में भी रामबक्ष ने निसंग होकर लिखा है ।

आजकल कुछ लेखक विवाद में आते ही कहते हैं कि यह बात मैंने अभिधा में नहीं व्यंजना में कही थी । इसके बारे में रामबक्ष कहते हैं : बात यह है कि अभिधा को झूठ बोलने की कला नहीं आती । यह कला तो जादूगरनी व्यंजना को ख़ूब आती है । पलटी मारने की तो वह विशेषज्ञ है । और लक्षणा ? वह तो जन्म की चुगलखोर है ।

किताब में किस्सों की भरमार है । एक स्टिंग-ऑपरेशन का भी ज़िक़्र है । यहाँ क्या क्या लिखूँ ? यही कह सकता हूँ कि यदि किसी को भारतीय गाँव के बारे में जानना है तो उसे बहुत सी अन्य क़िताबों के साथ ‘मेरी चिताणी’ भी पढ़नी पड़ेगी !

#मेरी_चिताणी १.

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