कोटा के अंतरंग जीवन-समाज का कोलाज |ओम नागर की डायरी ‘निब के चीरे से’ पर विजय राही की टिप्पणी

कथेथर गद्य की लोकप्रिय विधाओं में डायरी महत्वपूर्ण विधा है। हिन्दी में अज्ञेय, धर्मवीर भारती,हरिवंशराय बच्चन, मोहन राकेश,दिनकर, मुक्तिबोध, मलयज की डायरियाँ अत्यंत लोकप्रिय है।

हालांकि बीसवीं सदी में कथेथर गद्य की कई प्रमुख विधाओं का लोप हुआ है, लेकिन कथेथर गद्य में डायरी एक ऐसी विधा है, जिसका पुनर्वास हो रहा है।

यहाँ गौरतलब बात यह भी है कि आजकल लिखा तो ख़ूब जा रहा है, पर ज़ियादातर लेपटॉप, टेबलेट, मोबाईल पर लिखा जा रहा है, जो टीपने जैसा है और यह हम सब फेसबुक, ब्लॉग आदि पर देखते रहते हैं।

डायरी स्मृतियों को रेखांकित करने की एक विशिष्ट पद्धति है,जहाँ कहीं किसी गद्य-विधा में एकान्त क्षणों की स्मृतियों को श्रृंखलाबद्ध करने की आवश्यकता पड़ती है,इस विधा का प्रयोग कर लिया जाता है।

अब तो इस विधा में छोटी-छोटी कविताएँ भी समाविष्ट की जा रही है। श्रीकांत वर्मा और मलयज की डायरी में भी कविताएँ दर्ज है। इससे अनुभूति और चिंतन को घनत्व प्राप्त हो जाता है। डायरी विधा को लोकप्रिय बनाने में इन्ही महत्वपूर्ण लेखको का योगदान है।

पिछले बर्षों में युवा लेखकों ने भी डायरी विधा में बहुत अच्छा लिखा है। ऐसे ही आज के हमारे महत्वपूर्ण युवा लेखक ओम नागर है । ओम नागर जो कि कोटा,राजस्थान के रहने वाले है। ये उम्दा कवि भी है। उन्होने सुन्दर कविताओं के साथ साथ सुन्दर गद्य भी लिखा है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल कहते है कि गद्य कवि की कसौटी है। कवि ने इस कसौटी पर अपने को खरा साबित किया है।

ओम नागर केन्द्रीय साहित्य अकादमी के युवा पुरस्कार से भी सम्मानित है ।

‘निब के चीरे से’ लेखक की पहली डायरी है। इसी डायरी पर उन्हे ज्ञानपीठ का नवलेखन पुरस्कार भी मिला है।

हाल ही में नागर की “हाट “नाम से एक राजस्थानी में लिखी डायरी विधा की पुस्तक आई है ।राजस्थानी डायरी में यह नया प्रयोग है जिस ने अपनी ओर ध्यान आकर्षित किया है ।

‘ निब के चीरे से’ डायरी में कोटा शहर के जनजीवन के साथ लेखक ने अपनी अंतरंगता का वर्णन भी इस तरह किया है कि पाठक को अपना लगता है। यही एक अच्छी रचना की विशेषता भी है।

लेखक ने हाशिये पर पड़े समाज, किसान, मजदूर और औरतों, साधारण जनों की व्यथा को गहन संवेदनशीलता के साथ अभिव्यक्ति दी है ।

आप संवेदनशीलता का अंदाजा इससे भी लगा सकते है कि पंचर निकालने वाला ,भाड़ भूँजने वाली,नाई पर भी लिखा है,तो टर्की से आई ख़ूबसूरत लड़की जुलेहा से मुलाकात का जिक्र भी है।

खेती किसानी को लेकर गाँव के किसानों की परेशानी और उस पर हो रही राजनीति पर तीखा कटाक्ष किया।राजधानी दिल्ली में किसान द्वारा पेड़ के लटककर आत्महत्या करने पर लेखक ने पेड़ की पीड़ा को शब्द दिए है।

“मैं किसान हूँ

मेरे लिए आसमाँ में घिर-घिर आने वाले

काले पानीदार बादल

सुख और दुख दोनों सबब लिए आते है।”

बरसात के कई रूप इस डायरी में देखने को मिलेंगे।कभी रिमझिम जो प्रेमियों के चेहरे खिला देती है तो कभी ओलावृष्टि जो किसान को रूला देती है।

कोटा की लोक-संस्कृति,जनजीवन, मेलों,लोक कलाकारों का भी सरस वर्णन है,यहाँ तक कि हाड़ौती के मित्र कवियों ,लेखकों की कविताओं और ख़ूबसूरत मुलाकातों का जिक्र यहाँ लेखक ने किया है। यहाँ हाडौती के गावों का भोलापन है। तेजाजी के तमाशे,सागोद का न्हाण और अटरू की धनुषलीला पर बहुत विस्तृत जानकारी है।

कोटा की पहचान चम्बल है तो घटते जल स्तर की चिंंता भी है । धर्म,राजनीति, भ्रष्टाचार ,छुआछूत ,ओजोन परत ,टेक्नोलॉजी और वह सब जो एक आम आदमी के जीवन को प्रभावित करते हैं,सबको लेकर लेखक ने अपनी चिंता जाहिर की है ।

“सूरज की भट्टी में

तवे सी तप रही धरती

किसी दिन इसी तवे पर

सिक जायेगा जीवन।”

इस डायरी को लेखक ने साल 2015 को अपने अनुभव संसार में बाँधा है,जो अलग-अलग शीर्षकों में होकर भी एकता के सूत्र में हैंं।

शीर्षक लुभावने है जैसे-

‘उस्तरे के धार से कटती उदासी’

‘मुझे संतोष है यानि मछली की नींद पानी मे’

‘आकाश हँसता है बारिश की हँसी’

इस डायरी में हाडौती कविताएँ भी साथ है,जिससे सुन्दरता बन पड़ी है । अंबिका दत्त की एक कविता की बानगी-

“तावड़ो तेज

अर बायरो नरम

मौसम मं जाणै

चैत को भरम”

लेखक पाठक को लोक सौन्दर्य का अनुभव लोक भाषा में ही करवाता है। लोक शब्दों को

सहज रूप से बरता गया है…

कुछ लोक शब्द देखिए-गोखड़ा,पगथली,हथाई,सपड़ाव,फूली आदि।

डायरी में दर्शन की गहराई और विश्वव्यापी चिन्तन इसको लोक के साथ ग्लोबल बनाती है।

बीच बीच में सुन्दर जीवन रस से भरपूर कविताएँ है,जो डायरी में चार चाँद लगा देती है।इसमें कोई दोराय नही है कि ये कहानी,कविता,कथेथर का आनन्द अनुभव एक साथ करवाती है। इस तरह के नये लेकिन रोचक प्रयोग से लेखक ओम नागर की साहित्यिक चतुराई का पता चलता है।

डायरी की भाषा कसावट लिए हुए है। ओम नागर सधे हुए लेखक है, सो उन्होने यहाँ पाठक को निराश नही किया है। वो पाठक जो कविता पढ़ना ही पसंद करते है,गद्य नही पढ़ते है,वो भी ये डायरी पढ़कर निराश नही होंगे,क्योंकि यह डायरी अच्छा काव्यत्मक गद्य है।

यह 142 पेजों में छपी है।लेकिन कुछ पेज यदि ना भी होते तो डायरी पर कोई फर्क नही पड़ता।टंकण की कुछ त्रुटियां है,जो कभी-कभी खटकती भी है, लेकिन बहुत ज़ियादा भी नही है।

कवर पेज आकर्षक है।यह ज्ञानपीठ से प्रकाशित और पुरस्कृत है।डायरी हार्डबाउंड में है, मूल्य 250 रूपये है।यह अमेजन पर उपलब्ध है,आप सीधे ज्ञानपीठ से भी मँगा सकते है। तो आप भी पढ़िए और लेखक को शुभकामनाएं दीजिए।

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विजय राही
गाँव व पोस्ट बिलौना-कलाँ,
लालसोट, दौसा (राजस्थान)
सम्पर्क – 9929475744

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