घर में भी सम्मान मिला है ।

घर में भी सम्मान मिला है रामस्वरूप सिंदूर 

मैं प्रसंगवश कह बैठा हूँ 

तुम से अपनी रामकहानी !

मेरे मनभावन 

मन्दिर में बैठी हैं खण्डित प्रतिमाएँ,

विधिवत् आराधन जारी है, हँसी उड़ाती दसों दिशाएँ,

मूक वेदना के चरणों में, मुखर वेदना नतमस्तक है,

जितनी हैं असमर्थ मूर्तियाँ, उतना ही समर्थ साधक है,

एक ओर जिन्दगी कामना, एक ओर निष्काम कहानी!

बिखर गयी जिन्दगी कि जैसे बिखर गयी रत्नों की माला,

कोहनूर कोई ले भागा, तन का उजला मन का काला,

हारा मेरा सत्य, कि जैसे सपना भी किसी का हारे,

साँसोंवाले तार चढ़ गये, जो वीणा के तार उतारे,

खास बात ही तो बन पाती है, दुनिया की आमकहानी!

एक ज्वार ने मेरे सागर को शबनम में ढाल दिया है,

कहने को उपकार किया है, करने को अपकार किया है,

प्रखर ज्योति ने आँज दिया है आँखों में भरपूर अँधेरा,

मैं इस तरह हुआ जनजन का, कोई भी रह गया मेरा,

कामयाब है जितनी, उतनी ही ज्यादा नाकाम कहानी!

निर्वसना प्रेरणा कुन्तलों बीच छिपाये चन्द्रानन है,

आँसू ही पहचान सकेगा, लहरें गिन पाया सावन है,

मेरायहसौभाग्य,-किमुझको हर अभाव धनवान मिला है,

पीड़ा को बाहरजैसा ही, घर में भी सम्मान मिला है,

नामकमाने की सीमा तक, हो बैठी बदनाम कहानी!

एक उत्तर दें

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s