दीवड़ी में प्रेमजल | माधव राठौड़

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माधव राठौड़

युवा कवि-कथाकर माधव राठौड़ का सम्बन्ध थार के गाँव से है.उनका जन्म 1985 में हुआ. उनकी कहानी ” मार्क्स में मनु ” चर्चित रही है.माधव राठौड़ को भास्कर युवा सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है. वर्तमान में जोधपुर में रहते है. माधव की कविताओं धोरी- री धरती के कई रूपक मिलते है. वे कविता में नयी इमेज पैदा करते है.

अथाई पर उनकी पाँच नयी कविताएँ……

दीवड़ी में प्रेमजल

एक दिन मैंने धोरे के उस पार
उतरते सूरज से पूछा
फिर जून की ठंडी होती रात में पूनम के चाँद से पूछा
आषाढ़ के ऊपर चढ़ते बादल से पूछा
कि तमाम अकालों ,आँधियों और लू के थपेड़ों के बाद भी
कैसे बचा हुआ है इस रेगिस्तान में जीवन ?

सभी ने मुस्कराते हुए कहा
क्योंकि बचा है इनकी दीवड़ी में प्रेम जल
इसलिए यहाँ दुःख अकेले नहीं सामूहिक होते हैं ।

शापित प्रेमिका

एक बार बकरियाँ चराते ग्वाले से पूछा था
यह लू इतनी कामणगारी हुई क्यों फिरती है
उसने जवाब दिया
यह लू एक शापित प्रेमिका है
कभी पहाड़ से मीठा पानी लाने का वादा कर चली गई थी
किसी और सागर से मिलने

इधर इंतजार में समंदर
सूख कर रेगिस्तान हो गया

यहाँ आज भी देखी जा सकती है समंदर की वो कोड़ियाँ,शंख और भी कई जीवाश्म
और उसकी याद में कुरलाती हुई फिरती है यह बावळी लू

कुलधरा

कुलधरा तुम इतने उजाड़ क्यों हो अभी तक !
क्यों नहीं मुक्ति चाहते शापित होने से
क्यों सिंझते रहते हो हर बखत
भीतर ही भीतर
कब कम होगा तुम्हारा दाजणा
खाली क्यों नहीं करवाते
मीठे पानी की एक पखाल
सूने घर के आगे बनी टाँकली में
सच बताना
दिन ढ़लने पर लोगों के चले जाने बाद
डर नहीं लगता
तुम्हें अकेले में
इस सूनियाड़ अंधेरे में फैले डाकीपणे को देख !!

रेगिस्तान में नुगरा अकाल

नुगरा अकाल
कब छोड़ेगा इस थार को
उकळते उनाले से कब जी भरेगा तेरा
तुझे क्यों पसंद है सड़ांध मारती भेड़ें और गायों की हड्डियों के ढेर देखना
क्या करेगा मार कर
रामसिंग बा की बची हुई सूखी खंख तेलकी सांड को
रे दुष्ट
कुछ दया कर
औरण में बनी नाडी पर बिलबिलाते लोग-लुगाइयों पर
सांय-सांय करती बलबळती लाय और
दरवाजे खटखटाती भूतणी सी आंधी में
हर वक्त क्यों चाहता है भख
मरे हुए ऊँटों का
तेरा साथ देंगे सिर्फ नोचते गिद्ध और कुकाट करते कुते
इसे तुम कुछ क्यों नहीं बोलते ओ निर्लिप्त रेगिस्तान
क्या तुम्हारा भी मिनखपणा खत्म हो गया
या फिर नरेगा के मस्टरोल में तुम्हारा भी फर्जी नाम चलता है |

पगथळी

मेरी जींस पेंट में लगे भुरन्ट को निकालते हुए उन्होंने कहा था
दुनिया में जहाँ भी रहो उस जगह की प्रकृति के साथ मत खेलना
मैं उनकी पगथळियों की
फटी बिवाई को देख रहा था
कि देह से परे आत्मा है
जो मुक्त है
ज्ञान के तमाम बन्धनों से ।

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