अकबर आज़म की “परखनली”

सत्यम की टिप्पणी

परखनली कवर

आज़म क़ादरी और अकबर क़ादरी की किताब या यूं कहें कहानी शिल्प का खजुराहो “परखनली” उनकी मोहब्बत के साथ कुछ दिनों पहले मिली। आज घर आया तो पढ़ने लगा और एक ही बैठक में सारी कहानियां पढ़ ली।
म्यूजिक एलबम यूफोरिया के म्यूजिक एलबम को डायरेक्ट करने,दूरदर्शन के लिए तिब्बती शरणार्थियों की डॉक्यूमेंट्री बनाने, इम्तियाज़ अली की फ़िल्म रॉकस्टार में अभिनय, स्टार प्लस से लंबे जुड़ाव के बाद तिग्मांशु धूलिया की फ़िल्म में अभिनय के साथ फिलहाल मुंबई में रहकर अपने “अंतराल” थिएटर के द्वारा लेखन और निर्देशन के क्षेत्र में सक्रिय हैं।
जामिया मिल्लिया यूनिवर्सिटी और अभिनय के मक्का एनएसडी से औपचारिक शिक्षा ली।सैंकड़ो कहानियां 92.7 बिग एफएम लिए नीलेश मिश्रा के शो के लिए लिखी और वहीं से रसगुल्ले वाली कहानी सुनने के बाद इनसे इश्क़ हुए बिना नही रहा जा सकता।

अब बात किताब के बारे में-
अपनी पहली कहानी ‘आजाद बकरियां’ में आज बेनूर होते गांवों और सिसकियां भरते खेतों में कहानी के पात्र ‘मुज्जी’
के साथ आप भी यात्रा पर निकल पड़ते हैं। बकरियां चितली और काली मात्र बकरियां नही रह जाती। उनके चोट लगती है तो आंसू आपके भी टपक जाते हैं। शहर से आये दोस्त लल्लन और उसकी सेटिंग वाली बातें सुनकर गांव में रह गए मुज्जी जैसे लड़कों की लार चुवा जाती है। वो वाली पिक्चर के बारे में
दोस्तों की बात ‘मोए देख लेन दे यार तेने तो जाने कित्ती बार देखो होयगो’ जैसी पंक्तियों से आप एक बारगी मुस्कुरा उठते हैं। शहरीकरण की समस्या की जड़ वहीं है जहां मुज्जी का परिचय है कि ‘मुज्जी त्यागी नही था, क्योंकि उसने अभी तक कुछ भोगा नही था।’यूँ तो एक एक कहानी पर पूरे 400 शब्दो का निबन्ध लिखा जा सकता है। लेकिन मुज्जी की जिंदगी की तरह अन्य कहानियों का कर्ज भी चढ़ जाएगा।

दूसरी कहानी “बाबर!तुम भारत क्यों आये” सिर्फ एक कहानी नही बल्कि मंदिर मस्जिद के नाम पर बंटे जा रहे लोगों की मानसिकता की एक झलक है। मार्क्स, डार्विन, पुष्यमित्र शुंग, से लेकर रूह और जिस्म के बीच नोंक झोंक आपको सोचने पर मजबूर कर ही देती है। रिक्शे वाले की बात के माध्यम से एक आम भारतीय की सोच का किस तरह राजनेताओं द्वारा ध्रुवीकरण किया गया है , बेहद साफ़गोई से समझाया गया है।

कहानी ‘काजल धब्बा’ संघर्ष है एक विधवा का समाज से। संघर्ष है एक मां का अपने बच्चों के शिक्षा के अधिकार के लिए । संघर्ष है एक माँ का अपनी नेत्रहीन बेटी के लिए ख्वाइशें बुनने और सच साबित करने का। पता नही जमुनिया में इतनी तार्किक और आशावादी दृष्टि कहां से आती है कि वो ‘देखना सिखाने’ की बात झिलमिल से कहती है।
जमुनिया में आज़म भैया ने इतनी हिम्मत भर दी है कि झिलमिल के “माँ मुझे देखना सिखाओ न!” कहने पर भी वह डिगती नही है। वह रो नही पड़ती और आखिर कहानी रज्जु के सहारे एक सुखद अंत की तरफ बढ़ जाती है।

“किवणी का मजार” रूह के रूह से मिलने , किवणी के हम्जा और हम्जा के किवणी में समा जाने की कहानी है। यह कहानी है मोहब्बत की, मजार पर इत्र,फूल और ‘मुस्कुराहट’ बेचने की। ये कहानी है पेड़ के गाये गीत ‘उचिया लमियाँ टालियाँ ते बेलियाँ,विच वे वघे दरिया’ की। ये कहानी हर उस लड़की की रूह में समा जाती है जो घर की चारदीवारी में अपने अपने दायरों में कैद हैं। ये कहानी है मोहब्बत के जमीन से बेजान मजारों और आलीशान इमारतों तक पहुँच कर अर्थहीन हो जाने की।

अगली कहानी में नग्गो हर उस एक लड़की की कहानी है जिसके हाथ मे समय ने किताबों की जगह दरात और खुरपी थमा दी। उस ‘मिस इंडिया’ की जिसमे ‘इंडिया’ पूरी तरह ‘मिस’ है। लेखक कामवाली बाई के सहारे आपको देहात की लड़कियों की समझदारी की यात्रा करवा देता है। निराला की ‘ ‘वह तोड़ती पत्थर’ की तरह जिंदगी के प्रति उनका सकारात्मक रवैया उनकी जिंदगी बोझिल नही होने देता। अवसाद के वक़्त उनके हाथ मे शराब नही आ जाती। लेखक नग्गो के साथ साथ उसके प्रति अपनी मोहब्बत और फिक्र का खूबसूरत चित्रण करता है।

“मामा शकुनि!” हर उस भाई की कहानी है जिसकी बहिन ससुराल में अपने अधिकारों के लिए लड़ रही है। तरह तरह की तोहमत झेल रही है। उसका संघर्ष कभी कभी उसकी मौत के साथ ही खत्म होता है। शकुनि का एक अनदेखा चेहरा ही सामने आता है।

‘बहरूपिया’ हर आदमी की हमदर्दी के भीतर छिपे उस वहशी आदमी को सामने लाता है जो अपनी ताकत के बल और विश्वास की पीठ में छुरा घोपकर बलात्कार जैसी घिनौनी हरकत को अंजाम देता है। घुमक्कड़ जनजातियों की उस व्यथा की जिसके सामने पुश्तैनी कला के साथ साथ अपना पेट भरने की भी रोज की चुनौती है। “रुक साले! तोय जोई मोको मिलो तो भैंन को टनों मरावनो…।” सेठ का ये कथन सेठ के बहाने हम सब की मानसिकता को उधेड़कर रख देता है।

कहानी में रानी हर उस लड़की का प्रतिनिधित्व करती है जिसका जिस्म पर गिद्ध दृष्टि रखे वहशियों से रोज बस में, ट्रैन में, ऑफिस में आमना-सामना होता है। ऐसी दृष्टि जो सीने के उभारों से ऊपर कभी उठती ही नही।

“पगले का प्रेम पोस्टर” प्रेम में पड़े हर आशिक़ की कहानी है। दंगों की वीभत्सता में न जाने कितने प्रेम की बलि चढ़ा दी जाती है। कितने ही प्रेमी पागल होकर सदा के लिए शापित हो जाते हैं।

मैंने भैया से मोहब्बत सीखी है। जिंदगी जीने का नजरिया चाहिए तो कहानियां पढ़िए। विश्वास है मजा आएगा। घड़ियों की बजाय अपनो को समय का तोहफा दीजिए। कपड़ो की जगह किताब गिफ्ट कीजिए। अमेज़न पर ये किताब उपलब्ध है। सो पढ़िए,पढ़ाइये। मोहब्बत बरकरार रखिये। किताब जरूर खरीदें और पढ़िए।मैं अपनी वाली देने से रहा।

“अकबर आज़म की “परखनली”” पर एक विचार

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