कुलदेवी | पल्लवी

कुलदेवी पूरे कुल की अम्माँ थी
सदियों से,पीढ़ियों से
एक गाँव में एक छोटा सा मंदिर उसका घर था
और थी उसकी एक मूर्ति जो घर के सबसे बड़े के पास रहती

हर नौ दुर्गा की अष्टमी पर सारा कुल इकट्ठा होता
और कमरा बन्द करके घण्टों पूजा करता

बन्द कमरा ??
किसका भय था ?
कौन दुष्ट था जो पूजा में विघ्न डाल सकता था ?

घर में थीं दुष्ट कन्याएं जो उसी कुल में जन्मीं थीं
पर उस कुल की कभी न कहलाईं
बन्द कमरे के बाहर इधर उधर घूमतीं
कुल की उस अम्माँ से चिढतीं ,उसे गरियातीं
लेकिन कभी उस बन्द कमरे में घुस न पातीं

मोहल्ले भर में देवी बनकर जातीं उनके घर की नन्ही कन्याएं,पैर पुजातीं, प्रसाद खातीं
बस अपने ही घर में पराई और कुलहीन हो जातीं

अगर देख लेतीं देवी की मूर्ती को
तो कुल का नाश हो जाता
वाकई बड़ी मनहूस थीं वे कुलहीन कन्याएं

लेकिन वे लड़कियां नहीं जानतीं थीं कि
कुलदेवी भी उनकी राह सदियों से देख रही थी

सैकड़ों साल बूढी अम्माँ अपनी छोटी मिचमिचाती आँखों में पानी भरे प्रतीक्षा करती रहती
अष्टमी की उस महा आरती में अपनी बिटियाओं के स्वर की

सालों बीतते गये
बालक कमरे में घुसकर कमरा बन्द करते रहे
पूजा का प्रसाद खाते रहे
बालिकाएं चिढती,खिसियाती घर से बाहर भागती रहीं
‘ साला, क्यों रहें उस वक्त घर में ।
भाड़ में जाए कुल,भाड़ में जाए कुलदेवी ‘

एक दिन कुलदेवी आ पहुंची प्रातः सपने में एक कन्या के घर
गुस्साई कन्या का फूला मुंह देखा
औऱ बूढ़ी आँखों से चश्मा उतार रो पड़ी ज़ार ज़ार
पूरे खानदान की देवी एक बागी लड़की के समक्ष निरीह सी बैठी थी
एक निर्दोष अपराधिनी सी

तब लड़की ने जाना कि
अन्याय तो उस बूढी माँ के साथ हुआ
उसकी बच्चियों से उसे मिलने न दिया कभी उसी के बालकों ने

दोनों गले मिलकर रोती जातीं
देवी की प्यास उन आंसुओं से बुझती जाती
लड़की का सन्ताप उन आंसुओं से धुलता जाता
फिर दोनों ने एक साथ कॉफी पी
घण्टों बतियाईं अपने सुख दुख

अगली अष्टमी पर एक बन्द कमरे में सारा कुल इकट्ठा घण्टे,शंख ,घड़ियाल बजा रहा था
सामने देवी की मूर्ति थी
और देवी तो कब से उस मूर्ति से निकल भागी थी
अपनी लड़कियों के साथ तफरी करने

मगर दोनों ही इंतज़ार में हैं कि
एक दिन कमरा खुलेगा और
देवी के सारे बच्चे एक साथ गाएंगे प्रार्थना
मूर्ति में बैठी कुल की अम्माँ झर-झर झरायेंगी आसीस
अपने सब मौड़ा ,मौड़ी पर।

पल्लवी

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पल्लवी

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