बिटिया की संजा | ओम नागर

‘लोक’में अनुभूतियों और उन्हें व्यक्त करने के लिए चुने गए कला-माध्यमों का संसार बहुत व्यापक और बहुरंगी है । लेकिन आज वक़्त की रफ़्तार के आगे लोक की कई परम्पराएँ विलुप्त हो गई या होने की कगार पर है। मुम्बई जैसे महानगर से गाँव लौटा तो घर के बाहर की दीवार पर बिटिया की “संजा” देख कर चकित रह गया। लोक ने तो अपने दुःख में लय में गाये है, हमारे लोकगीतों में हज़ारों उदाहरण मिल जाएँगे।

आज की नयी पीढ़ी निरंतर अपने गाँव, घर, भाषा-बोली और अपनी लोकपरम्पराओं से विलग होती जा रहीं है। लेकिन गर्व है कि बिटिया पारुल न भाषा भूली है और न ही उसके मन में लोक की परंपरा के प्रति उदासी का भाव है। संतोष है कि उसकी स्मृति के आँगन में सदा एक सुंदर संजा रहेंगी। और कण्ठ में बचे रहेंगे अपनी संजाबाई के लिए रोज सूरज ढलने के बाद, अपनी भाईल्यौ के संग गाये संजा-गीत। कल ढलती साँझ बिटिया के मुँह से ही यह संजा-गीत सुना:- यूँ गीत तो और भी है, वो फिर
कभी।

” खोड्यौरी मसकोड्यौ नाई
म्हारी सेझा नै लैबा आयौ
तमण्यौ बेच तमाकू लायौ
आखै गेलै – पीतो आयौ
धंस्यु -धंस्यु करतौ आयौ
बीतग्यौ तो रोतो आयौ ।
मरियो री माँ, मरियो माँ।। “

अश्विन मास की प्रतिपदा से कुँवारी कन्याओं का यह
अनूठा अनुष्ठान है। घर के बाहर की दीवार पर गोबर
से बनाई जाने वाली संजा में वो सब आकृतियाँ बनाई
जाती है जो कन्याओं के भावी जीवन में बावस्ता होनी
होती है। गृहस्थी और जीवन संसार से जुड़े कई रंग होते है। पितृपक्ष में इस पर्व आने का उत्तर तो मैं नहीं जानता। इन्हीं सौलह दिनों तक रोज कुँवारी कन्याएं अपनी प्यारी संजा को फूलों से सजाती है। लाल और पीली कनेर के फूल-पत्तियाँ और भी कई रंग होते है संजा के आँगन।

संजा के भीतर और बाहर के हिस्सों में गोबर से कई
आकृतियाँ बनायी जाती है। जिनमें प्रमुख रूप से होती
है-” चाँद-सूरज, घट्टी-चूल्हा, परैन्डी, बान्दरवाळ, पाँच पचेटा, ढोली-ढोलण, सांप की तलाई, खँजूर, केळ, बुहारा, स्वस्तिक, बन्दर, कौआ, दीयाथान, जनेऊ, राजा-रानी, सात सहेल्यां, गणेशजी, बारह लोया, बीजणी आदि-आदि।

संजा, साँझा, साँझी आदि किसी लोक प्रचलित नाम ले लीजिए। आँचलिक भिन्नताएँ तो स्वाभाविक है। हमारी विभिन्नताएँ ही हमें सांस्कृतिक रूप से समृद्ध बनाती है। संजा बनाने की परंपरा और अन्य पौराणिक कथाओं से अनभिज्ञ हूँ। लोक में सामान्य किवदंती है भी यह है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को वर के रूप में प्राप्त करने के लिए एक दिन अपनी सहेलियों के साथ खेल-खेल में संजा बनाकर,व्रत किया। कारण और भी कई हो सकते है, सृष्टि में कुछ भी तो अकारण नहीं, वो आप हो या फिर मैं या फिर लोककलाओं का यह अनूठा संसार।

#गाँवइनदिनों #लोकरंग (चित्र और कथ्य ओमनागर की वाल से आभार सहित)

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