हिन्दी आलोचना के अपराध ३. | कृष्ण कल्पित

मुझ पर हिन्दी के सारे दरवाज़े बंद हैं । कदाचित मैं इस समय हिन्दी का सर्वाधिक उपेक्षित कवि-लेखक हूँ । मेरे बग़ैर पत्रिकाओं के विशेषांक छपते रहते हैं जो एक तरह से अपराध की श्रेणी में ही आता है । किसी सूची में मुझे शामिल नहीं किया जाता । मेरी किताबें नहीं छपने दी जातीं । हर तरह से मुझे ठुकराया जाता है । पुरस्कार-सम्मान तो दूर की बात तिरस्कार और अपमान ही अब तक पाया ।

एक वरिष्ठ कवि ने कहा कि मैं फ़ेसबुक पर ख़ुद को क्यों बर्बाद कर रहा हूँ । अज़ीब बात कि मुझे बर्बाद करने वालों से अब मेरी बर्बादी भी नहीं देखी जाती । हिन्दी के सत्तावानों की इच्छा है कि अब मैं यहाँ लिखना भी बंद कर दूँ और विलोप हो जाऊँ या मर जाऊँ ।

तीन दिन पहले ‘हिन्दी आलोचना के अपराध’ शीर्षक से एक सीरीज़ लिखनी शुरु की तो हमारे मित्र, आलोचक और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर डॉ गोपेश्वर सिंह को शायद नागवार गुज़रा । पता नहीं क्यों ? वे इस श्रृंखला की अब तक लिखी दोनों टीपों पर आये और उपहास उड़ाने की भाषा में लिखा कि आपका तीर निशाने पर नहीं लगा । जैसे मैं कोई लेखक-कवि नहीं तीरंदाज़ हूँ ।

गोपेश्वर सिंह मेरे पसंदीदा हैं । विनम्र, पढ़ने-लिखने में यकीन करने वाले । जैसे प्रोफ़ेसर इन दिनों दिखाई देते हैं उनमें वे बहुत भले लगते हैं । दूसरों की तुलना में समझदार भी शायद हैं । वे एक ग़रीब लेखक का मख़ौल क्यों उड़ाएंगे ? शायद उन पर भी अब दिल्ली का असर आ रहा होगा ।

हिन्दी के कुछ प्रोफ़ेसर बहुत अच्छे हैं लेकिन अधिकांश हिन्दी साहित्य के अपराधी हैं । आलोचना के अपराधों पर लिखा जायेगा तो उसमें अपराधियों का ज़िक्र भी आयेगा । अधिकतर हिन्दी के प्रोफ़ेसरों ने अपने घर में एक-एक पत्रिका डाल रखी है । कुछ प्रोफ़ेसर बनने के बाद पत्रिका निकालने लगते हैं तो कुछ पत्रिका निकाल कर प्रोफ़ेसर बन जाते हैं ।

पत्रिकाओं के स्तर की बात छोड़ दीजिए ये किस नियम के तहत विश्वविद्यालय की नौकरी करते हुये पत्रिका निकालने का व्यापार कर सकते हैं यह कोई नहीं पूछता । न यूजीसी न विश्वविद्यालय प्रशासन । इन पत्रिकाओं के जरिये वे गुटबाजी फैलाते हैं और पदोन्नति पाते हैं ।

दिल्ली विश्विद्यालय के एक अपूर्व क्रांतिकारी प्रोफ़ेसर सारे दिन एक न्यूज़-पोर्टल पर बैठकर क्रांति करते रहते हैं । ये पढ़ाते कब हैं कोई पूछने वाला नहीं । लेख लिखना बाइट देना अलग बात है लेकिन ये महाशय तो स्टूडियो में हर-रोज़ बैठकर न्यूज़-कास्टर का काम करते हैं और अच्छा-ख़ासा मुआवज़ा भी पाते हैं । क्या यह अनैतिक या धतकरम नहीं है ?

पहले मैं हिन्दी आलोचना के अपराधों पर ही एक किताबचा लिखना चाह रहा था लेकिन गोपेश्वर बाबू के उपहास ने मुझे नई दृष्टि दी । अब अपराधों के साथ अपराधियों पर भी इस श्रृंखला में ध्यान दिया जायेगा ।

और यह बात गोपेश्वर सिंह और मेरे अन्य आलोचकों को समझ लेनी चाहिये कि कृष्ण कल्पित उपेक्षा, आलोचना, उपहास, व्यंग्यबाणों से नहीं डरने वाला । ये सब मेरे बचपन के साथी हैं, इनका साथ मैं कैसे छोड़ सकता हूँ । मैं हिन्दी के अधिकांश प्रोफ़ेसरों की तरह कृतघ्न नहीं हूँ ।

यही सिर्फ़ दिलासा है कि मुझे चाहने वालों की एक भारतीय-फ़ौज़ भी है । यही मेरी ताक़त है !

#हिन्दी_आलोचना_के_अपराध ३.

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