हिन्दी आलोचना के अपराध ४. | कृष्ण कल्पित

2011 में काशीनाथ सिंह के उपन्यास ‘रेहन पर रग्घू’ को लीलाधर जगूड़ी और अरुण कमल जैसे कवियों की जूरी ने साहित्य अकादेमी पुरस्कार दिया तो कल्बे कबीर ने 4 दोहे कहे थे जो ‘बाग़-ए-बेदिल’ किताब में दर्ज़ हैं :

रेहन पर रग्घू चढ़े
असी घाट पर कासी
भारी एक अचम्भा देखा
जल बिन मीन पियासी ।।१।।

लीलाधर लीला रची
अरुण कमल के साथ
नाथ सिंह पर चढ़ गये
बाक़ी हुये अनाथ ।।२।।

कथाकार चुनते कवि
कवि कहानीकार
इस हिन्दी-संसार की
माया अपरम्पार ।।३।।

जब घूरे के फिरत हैं
तू भी रख बिसवास
तेरे भी फिर जायेंगे
जैसे उदय प्रकाश ।।४।।

इससे पहले काशीनाथ सिंह ‘कासी का अस्सी’ लिखकर मशहूर हो चुके थे । इस भदेस रिपोर्ताज़ को भी उपन्यास कहकर प्रकाशित किया गया । जब ‘रेहन पर रग्घू’ प्रकाशित हुआ तो नामवर सिंह ने उपन्यास की बहुत तारीफ़ की । कहा कि काशीनाथ सिंह ने उपन्यास के पुराने ढाँचे में तोड़ फोड़ की है और अपनी नई शैली विकसित की है ।

नामवर सिंह की प्रशंसात्मक आलोचना पढ़कर काशीनाथ सिंह के समधी और हिन्दी के विलक्षण लेखक-आलोचक दूधनाथ सिंह ने नामवरजी को टेलीफ़ोन पर कहा : काहे इतनी तोड़फोड़ कर रहे हैं इससे तो अच्छा है कि तिवरिया से बात कर लीजिये ! इस समय विश्वनाथ प्रसाद तिवारी साहित्य-अकादेमी के अध्यक्ष थे । नामवरजी ने तिवरिया से बात की या नहीं पता नहीं लेकिन उस वर्ष का साहित्य-अकादेमी-पुरस्कार काशीनाथ सिंह को देने की घोषणा हो गई ।

इससे पूर्व 2003 में दूधनाथ सिंह का विलक्षण उपन्यास ‘आख़िरी कलाम’ प्रकाशित हो चुका था । बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद की साम्प्रदायिक स्थितियों से जूझने वाले दूधनाथ सिंह सम्भवतः अकेले लेखक थे । ‘आख़िरी कलाम’ तुलसीदास के ‘रामचरित मानस’ की सबसे बड़ी आलोचना है । कोई एक किताब देश और समाज का कितना बड़ा नुक़सान कर सकती है यह सब उपन्यास में वर्णित है । निश्चय ही ‘आख़िरी कलाम’ हिन्दी का बड़ा उपन्यास है। मेरी दृष्टि में नई शताब्दी में हिन्दी में ‘आख़िरी कलाम से बड़ा उपन्यास नहीं लिखा गया ।

नामवर सिंह ने ‘आख़िरी कलाम’ की कड़ी आलोचना की । एक बैठक में इसे लेकर नामवरजी से मेरी बहुत बहस हुई । नामवरजी के चेलों ने भी उपन्यास की निंदा की और दिवंगत कथाकार अरुण प्रकाश ने नामवरजी की लाइन पर ‘आख़िरी कलाम’ की धज्जियां उड़ा दी । बाद में दूधनाथ सिंह ने अरुण प्रकाश पर एक अशोभनीय टिप्पणी की : कौन अरुण प्रकाश ? वही जो थोरा लंगराकर चलते हैं !

कुल मिलाकर ‘आख़िरी कलाम’ जैसे विलक्षण उपन्यास को साहित्य अकादेमी पुरस्कार नहीं मिलने दिया गया । जब नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह और काशीनाथ सिंह को साहित्य अकादेमी दिया गया तो बेचारे ग़रीब ठाकुर दूधनाथ सिंह को क्यों छोड़ दिया गया ? उन्होंने किसकी भैंस खोली थी ? ‘रेहन पर रग्घू’ का तो पता नहीं लेकिन ‘आख़िरी कलाम’ ज्यों ज्यों वक़्त बीतता जायेगा और प्रासंगिक होता जायेगा । यह हिन्दी आलोचना का एक जघण्य अपराध है जिसका फ़ैसला वक़्त नामक सबसे बड़ा आलोचक एक दिन ज़रूर करेगा !

#हिन्दी_आलोचना_के_अपराध ४.

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