द्रोहकाल_का_पथिक १. | कृष्ण कल्पित

कुछ जयपुर में समझे होंगे कुछ पटना-बीहार में
मेरी बात न समझा कोई दिल्ली के बाज़ार में !

पटना – बिहार से मेरा रिश्ता गहरा है । अपने जीवन के कोई दस वर्ष राँची और पटना में बीते । ‘एक शराबी की सूक्तियाँ’ और ‘बाग़-ए-बेदिल’ कृतियाँ पटना में ही पूर्ण हुई । जितने मित्र मेरे पटना में हैं उतने जयपुर में नहीं । पिछले कुछ दिनों से पटना के हालात चिंतित करने वाले हैं । अब शायद पानी उतर रहा होगा ।

30 सितम्बर को हिन्दी और मैथिली की यशस्वी लेखिका उषाकिरण खान ने पटना के समाचार रोचक शैली में देते हुये लिखा : आलोकधन्वा सूखे इलाके में है, कर्मेंदु शिशिर भाग लिए, हृषिकेशवा भी भगे, अरुण कमल भी बाहर ही होंगे । हाँ अवधेश प्रीत और संतोष दीक्षित फंस गए लगता है । हम भी सूखे में हैं, यही राहत है ।

लेकिन अपने पोस्टकार्ड में उषाजी बिहार के एक हिंदी लेखक का हालचाल लिखना भूल गई, जिसकी 2013 में प्रकाशित प्रथम किताब के लोकार्पण समारोह में हंगामा हो गया था । नामवर सिंह ने किताब का लोकार्पण किया था और किताब का सम्पादन और शीर्षक हिन्दी कहानी के डॉन राजेन्द्र यादव ने किया/दिया था । यह किताब पप्पू यादव की आत्मकथा थी जिसका नाम था – द्रोहकाल का पथिक ।

बुद्ध की भविष्यवाणी को याद दिलाती पटना की भयंकर बाढ़ अथवा पानी जमाव में पिछले कुछ दिनों से यही पप्पू यादव अपनी नाव पर अपने साथियों के साथ घूमते हुये राहत सामग्री बांटते दिखाई पड़ रहे हैं ।

नीतीश कुमार जब अपने घर की छत पर छाता लिए, सुशील मोदी किसी शरणार्थी की तरह फ्लाई ओवर पर खड़े और पटना सांसद पानी में डूबते नज़र आ रहे थे तब यही पप्पू यादव किसी रोबिनहुड की तरह अपनी नाव में हिचकोले खाते हुये लोगों को बचाते और खाना और पानी की बोतलें बांटते हुये दिखाई दे रहे थे । आज पानी उतरने के बाद भी वे राहत के कार्य में जोर शोर से जुटे हुये हैं ।

द्रोहकाल के पथिक को सलाम !

#द्रोहकाल_का_पथिक १.

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