प्रेमासक्त हुई तुम संग |लिली मित्रा की ‘अतृप्ता’ पर प्रीति कर्ण

प्रेमासक्त हुई तुम संग
मैं प्रेम शंख का निनाद करती हूं…
मैं तुम्हें विख्यात करती हूं
हे साहित्य!
मैं तुम्हें आत्मसात करती हूं…..
इस दृढ़ता को लेकर जब कवियित्री अपनी कविताओं का उद्बोधन करती है मन स्वत:भावधारा की ओर मुड़ जाता है!
नदी आड़ी टेढ़ी सुगम दुर्गम जैसी भी राह धर लेती है प्रवाह की अविरलता बाधित नहीं होती यदि उद्गम सूखते नहीं….
‘अतृप्ता’ एक ऐसा ही संकलन है कविता का जिसमें लिली मित्रा की भाव कुशलता ने अद्भुत रंग बिखेरे हैं।
जीवन के मध्य विविधताओं से आकार लेती रचना अपने आसपास की पृष्ठभूमि का आधार लेकर खड़ी कहीं
यादों की रजनीगंधा सी महकती हैं…
और कहीं “ऐलिफैंटा के भित्तिचित्र” का आकलन करने लगती हैं।
मैं कई बार पढ़ती हूं “अपराजिता की अभिलाषा”…..
मन पर किये अमिट दस्तख़त सी है।
“मैं आत्माओं का संभोग चाहती हूं
वासनाओं के जंगल काट
दैविक दूब के नरम बिछौने
सजाना चाहती हूं……. अतृप्ति की आत्मा को समर्पित भाव अनंत यात्रा की ओर अग्रसर हैं……!
ये प्यास बनी रहे !!
असीम शुभकामनाएं

प्रीति कर्ण

एक उत्तर दें

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s