मूवी रिव्यु “जोकर”

कुछ फ़िल्में आपको इंसानी तौर पर ख़ाली कर जाती है. आप में कुछ किरदार इस क़दर उतरते हैं कि आप एक ट्रान्स में चले जाते हैं. फ़िल्म ख़त्म होने के बाद सिनेमा-घर से निकल कर वो कैरेक्टर आपके साथ आपके स्पेस में चले आते हैं.

अर्थर फ़्लेक भी कुछ-कुछ ऐसा ही है मेरे लिए!

बाक़ियों की तरह मैं ये नहीं कह सकती कि अर्थर से मुझे मुहब्बत है या नफ़रत है. बस कुछ ऐसा है उसका किरदार की ज़हन में ठहर सा गया है.

फ़िल्म शुरू होती है एक डार्क और ग्लूमी जगह से. जिसका नाम गॉथम सिटी है. शहर एक तरह के हड़ताल से गुज़र रहा जिसके तहत शहर में फैले गन्दगी की सफ़ाई नहीं हो पा रही. मोटे-मोटे चूहे अपने बिल से निकल कर कचरे की ढेर की तरफ़ भाग रहे. ये चूहे शहर के सबसे ग़रीब तबके को सिग्निफ़ाई करते हैं. पूरा शहर पीली सी रौशनी में नहा रहा मगर इस पीली रौशनी में ख़ुशियाँ नहीं अवसाद घुलता दिख रहा. लोग बेमक़सद यहाँ से वहाँ जाते दिख रहें.

ऐसे में हमारा हीरो अर्थर जो किसी के लिए विलेन भी हो सकता है उसकी एंट्री होती है.

अर्थर जिसने अपनी आधी ज़िंदगी मुफ़लिसी और अपनी बीमार माँ की देख-रेख करते हुए गुज़ार दिया है. मगर उसने अपने सपनों पर गिव-अप नहीं किया है. उसे यक़ीन है कि एक दिन वो स्टैंड-अप कमीडीयन ज़रूर बनेगा. फ़िलहाल घर चलाने के लिए वो जोकर बन कर कभी बीमार बच्चों के हॉस्पिटल जाता है तो कभी सड़कों पर फ़्लायर पकड़ कर खड़ा रहता है. लेकिन उसका होना किसी के लिए मायने नहीं रखता. उसकी ख़ुशियों या ग़म से किसी को फ़र्क़ नहीं पड़ता. भीड़ में होता है मगर किसी को भी वो नहीं दिखता.

फिर थोड़ी फ़िल्म आगे बढ़ती है तो हमें पता चलता है कि अर्थर मानसिक रूप से थोड़ा बीमार है. बचपन में उसे मॉलेस्ट किया गया साथ ही साथ उसके सिर पर किसी चीज़ से मारा गया, जिस वजह से ‘हिस्टीरियाई हँसी’ वो नहीं चाहते हुए भी हँसने लगता है. ये हँसी ऐसी है कि आस-पास के लोग असहज होने लग जाते हैं उसकी मौजूदगी में.

सिर्फ़ इतना ही नहीं ज़िंदगी भर वो इस क़दर अकेला रहा है कि अब उसने जागती आँखों से सपने बुनने शुरू कर दिए हैं. अपने सपनों की दुनिया में वो किसी के साथ डेट पर जा रहा. जब वो अपनी बीमार माँ के पास अकेले बैठा है तो उसकी प्रेयसी उसका माथा चूम ले रही है.

लेकिन फिर ये तो अर्थर के सपने हैं न. हक़ीक़त से बिलकुल अलहदा. ज़िंदगी के इम्तिहान बाक़ी हैं उसके लिए. लोग जिन्हें अपने अलावा किसी की भी नहीं पड़ी, जो White-कॉलर जॉब में हैं. जिन्हें ये लगता है कि दुनिया उनकी जूते की नोक पर है. ऐसे लोगों से अर्थर का सामना होना बाक़ी है. अर्थर को ये भी पता नहीं कि शहर का सबसे रईस शख़्स ही उसका बाप है.

ख़ैर, अर्थर जैसे-जैसे दुनिया के क़रीब जाता है उसे इस दुनिया का कुरूप चेहरा नज़र आने लगता है. ये दुनिया ऐसी है जहाँ ताक़तवर और ताक़तवर हुए जा रहें और ग़रीब-बेसहारा दबाए-कुचले जा रहें. ये मजबूर लोग सिर्फ़ वोट के वक़्त नेताओं को याद आते हैं बाक़ी उसके बाद वो ज़िंदा हैं या मर गये किसी को फ़र्क़ नहीं पड़ता.

लेकिन कब तक कोई अपने साथ हो रहे नाइंसाफ़ी को झेलेगा. अर्थर को भी एक दिन लगता है कि अब बहुत हो गया.

Can not take this shit anymore!

अपने लिए स्टैंड लेना ही पड़ेगा. अपने हक़ के लिए लड़ना ही पड़ेगा. फिर अर्थर फ़्लेक, अर्थर से जोकर बनता है. जोकर, जो सिर्फ़ अब बच्चों को हँसाने का काम नहीं करता बल्कि ऑन द स्पॉट फ़ैसला करता है किए जा रहे गुनाह का.

फ़िल्म को ले कर कॉंट्रडिक्शन यहाँ से शुरू होती है. कुछ लोगों को लग रहा है कि मेंटल इलनेस की आड़ ले कर टॉड-फ़िल्प (director) सीरियल-किलिंग को ग्लोरिफ़ाई कर रहें. अर्थर यानी जोकर को हक़ नहीं है किसी की जान लेने की. मगर अर्थर अब उन सभी दबे-कुचले लोगों के लिए हीरो बन चुका है जिनके लिए कोई स्टैंड नहीं लेता.

ऐसा सिर्फ़ फ़िल्म में ही नहीं रियल में भी यूथ को लग रहा. ये देश के वो युवा हैं जिनके पास नौकरी नहीं है. जिनके पास मोटिवेशन नहीं है ज़िंदगी को ले कर. वो छोटे या बड़े शहरों के भीड़ का वो हिस्सा है जो अपनी ज़िंदगी से इस क़दर फ़्रस्ट्रेटेड है कि जैसे ही उन्हें मौक़ा मिलता है वो भीड़ की शक्ल इख़्तियार करके ऑन द स्पॉट फ़ैसला देने पर उतारू हो जाते हैं. भारत में बढ़ रही लिंचिंग और अमेरिका में हो रहे मास-शूटिंग ऐसे ही युवाओं की कुंठा को बयान कर रही है.

बरहाल मैं फ़िल्म पर लौटती हूँ. मैंने ‘बैटमैन सिरीज़’ की एक भी फ़िल्म नहीं देख रखी. मुझे जोकर के ओरिजन का कोई आयडीआ नहीं इसलिए मेरे लिए ये फ़िल्म अपने आप में एक कम्प्लीट पैकेज है. टॉड-फ़्लिप की मैंने हैंगओवर देख रखी है तो मुझे उनके डायरेक्शन बनी ये फ़िल्म कमाल लगी है.

अब आते हैं अर्थर बनें Joaquin Phoenix पर. ओह माई-माई!!! उनकी फ़िल्मों की मैं फ़ैन रहीं हूँ. बात चाहे #Her की करें या #IrrationalMan की करूँ ये हर किरदार में ढल जाते हैं. जोकर बनने के लिए 30 किलो वज़न कम करना जिससे की फ़िल्म में वो एक बीमार शख़्स दिख सकें. मेंटल इलनेस को जस्टिफ़ाई करने के लिए कई सारे रिसर्च पेपर से गुज़रना ही उन्हें बाक़ी के ऐक्टर्स से अलग करता है।। फ़िल्म की शुरुआत में आप देखेंगे कि उनके कंधे झुके हुए हैं. सड़क पर वो सहमे हुए से चल रहें. लेकिन जैसे-जैसे वो अपनी कमियों को own-up करते हैं कॉन्फ़िडेंस आप उनकी चाल-ढाल में देखेंगे. सीढ़ियाँ जिनसे हो कर वो हर दिन घर जाते हैं थक-हार कर उन्हीं सीढ़ियों से जब वो डाँस करते हुए उतरते हैं तो लगता है कि दुनिया ऑर्थर की क़दमों में है. उन्होंने जीत लिया है सब कुछ.

ये लिखते वक़्त भी कानों में वो धुन प्ले होती जान पर रही जिस पर अर्थर थिरक रहा. मेरे लिए सही ग़लत से पड़े ये एक ऐसी फ़िल्म है जो महीनों तक मेरे दिमाग़ में रहेगा और Phoenix दिल में!

-अनु रॉय की फेसबुक वॉल से साभार

#Joker

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