समन्वय के शायर ‘फ़िराक़’ | आलोक रंजन

कई मायनों में मुझे फ़िराक़ समन्वय के शायर लगते हैं। उनकी शायरी में आया हुआ समाज हिंदी का है लेकिन शायरी की परंपरा उर्दू की। राही मासूम रज़ा एक जगह कहते हैं – हिन्दी और उर्दू एक ही भाषा हिंदवी के दो नाम हैं। इस तरह से देखें तो फ़िराक़ समूची हिंदवी को लेकर आते हैं।

हिन्दी समाज का अपना सामाजीकरण है जो ज़ाहिर तौर पर उर्दू शायरी परंपरा में ठीक से परिलक्षित नहीं हुआ है। नज़ीर अकबरबादी जैसे कुछ शायर लिखते तो हैं लेकिन वह हिन्दी की समग्र समाजिकता उठाने के बदले ‘हिन्दू’ सामाजिकता ही ले पाते हैं। ऊपर से उनकी बातें एक ‘बाहरी’ की बातें लगती हैं। इस तरह देखा जाये तो शायरी में एक बड़ा क्षेत्र अछूता रह जाता है। बाजार की भाषा में कहें तो अनएक्सप्लोर्ड रह जाता है । इसके उलट दूसरी बात भी है कि हिन्दी परंपरा के शायर अर्थात जिनका पालन –पोषण हिन्दी में हुआ, वे उर्दू की नफासत और कलात्मकता से ज़्यादातर दूर ही रहे हैं। इस मामले में दुष्यंत जैसे नाम अपवाद जरूर हैं । यहीं पर फ़िराक़ की ओर देखने की जरूरत है। उस समन्वय की ओर जो वे इन दो अलग परम्पराओं का समांग मिश्रण तैयार कर के लाते हैं, उस ओर। फ़िराक़ हिन्दी संस्कार को कमाल के उर्दू लबो-लहज़े में रखते हैं। उनकी कुछ रुबाइयों में यह स्पष्ट रूप से दिखता है। उनमें पर्व-त्योहारों वाले घर के सामान्य कामों वाले बिम्ब अद्भुत भाषा और शैली में आते हैं। एक उदाहरण देखिये –

आँगन में ठुनक रहा है जिदियाया है
बालक तो हई चाँद पर ललचाया है
दर्पण उसे दे के कह रही है माँ
देख आईने में चाँद उतर आया है

इस रुबाई को सूरदास की उस पंक्ति से जोड़कर देखिए जब वे लिखते हैं – मैया मैं तो चंद खिलौना लैहों । वात्सल्य रस में चाँद का प्रयोग लाना हिन्दी लोक की विशेषता है।

यहीं फ़िराक़ का एक शेर भी देखा जा सकता है –

फितरत का कायम है तवाजुन अलामे – हुस्नो – इश्क़ में
उसको उतना ही पाते हैं खुद को जितना खो ले हैं ।

यहाँ कबीर को देखिए – सीस उतारे भुईं धरे तब मिलिहें करतार ।

कबीर ही क्यों तमाम धार्मिक वाङ्ग्मय और आचार – व्यवहार अहंकार के त्याग की शिक्षा अबतक दे रहे हैं । (ये अलग बात है कि हम त्यागते नहीं)।

फ़िराक़ में दूसरा समन्वय दर्द और ठसक का दिखता है । शायर का दर्द और शायर की ही ठसक । दोनों मिलकर शायरी और शायर को गहरा करती है । वियोगी होगा पहला कवि आह से उपजा होगा गान की तर्ज़ पर कसें तो दर्दविहीन शायरों में केवल ठसक ठसक है बस ! केवल ठसक वाले शायरों से आगे बढ़ते हुए फ़िराक़ को देखते हैं ।

तेरे ग़म का पासे-अदब है कुछ दुनिया का खयाल भी है
सबसे छिपा के दर्द के मारे चुपके –चुपके रो ले हैं ।

यह दर्द पर उनका सबसे हल्का शेर है लेकिन कईयों के समूचे रचनाकर्म में ऐसा शेर नहीं मिलेगा । फ़िराक़ के गहरे शेर तो छोड़ ही दें। उनकी ठसक देखिए –

सदके फ़िराक़ एजाजे –सुख़न के कैसे उड़ा ली ये आवाज़
इन ग़ज़लों के परदों में तो ‘मीर’ की ग़ज़लें बोले हैं।

मज़ा इस बात का आता है कि, शायर अपने पूरे आत्मविश्वास में अपनी तुलना ‘मीर’ की शायरी से करता है। आनंद इस बात का कि मीर, ग़ालिब के भी नज़ीर रहे। फ़िराक़ और ग़ालिब दोनों ही उसी ठसक से अपनी बात कहते हैं। ग़ालिब को देखिए –

रेख्ते के उस्ताद तुम्ही नहीं हो ग़ालिब
कहते हैं अगले जमाने में कोई मीर भी था

छात्रों को फ़िराक़ पढ़ाने में बड़ा मज़ा आता है। एक सच इसके साथ और कि उतना मज़ा किसी और कवि की रचना पढ़ाने में नहीं आता। ग़ज़ल दुष्यंत की भी पढ़ानी होती है लेकिन वहाँ उतनी तैयारी की आवश्यकता नहीं होती। न ज्यादा पढ़ना , न देखना सुनना। बहुत हुआ तो मनोज वाजपेयी द्वारा पढ़ी गयी – हो गयी है पीर पर्वत सी –दिखा दी तो दिखा दी। छात्र मनोज को पहचानते हैं। उन्होने दक्षिण की कई फिल्मों में अभिनय किया है। पर फ़िराक़ चुनौती की तरह आते हैं। दोहरी चुनौती! पहले तो खुद समझो फिर उन छात्रों को समझाओ जो फ़िराक़ के बिंबों, रूपकों और तरीकों से सर्वथा अनजान हैं।

कक्षा में जब मीर का ज़िक्र आया तो मैंने छात्रों को गुलज़ार द्वारा बनाई गई फिल्म ग़ालिब के एक हिस्से में आए मीर के संदर्भ को दिखाया। वहाँ ग़ालिब रेख्ते के शुरुआती उस्तादों में मीर को कायम करते हैं। उससे पहले मीर का एक शेर गाता हुआ कोई व्यक्ति आता है –

पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग तो सारा जाने है …

छात्रों ने इस शेर का अर्थ पूछ लिया । इस पर मैंने बस इतना कहा कि एकतरफा प्रेम की बात है जाने दो!

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