हर्षिता पंचारिया | जन्मदिन 5 नवम्बर

आलोक धन्वा की प्रसिद्ध कविता भागी हुई लड़कियाँ की पंक्ति “कितनी-कितनी लड़की / भागती है मन ही मन / अपने रतजगे, अपनी डायरी में!” हर्षिता पंचारिया की कविताएँ स्त्री मन की डायरी है. हालाँकि खुद को स्त्रीवाद कहने में परहेज़ करती है.

कविताएँ सामाजिक विमर्श का विषय कब बन जाए. इसका तत्काल पता नही चलता है. पहली कविता में पुरुष द्वारा निर्मित सामाजिक बन्धनों पर सवाल खड़ा करती है. कविता ना किसी प्रश्न का उतर है ना समस्या का समाधान.

हर्षिता ने अन्य विषयों पर बेहद खूबसूरती से लिखा है. जिसमे उनका स्त्री मन मौजूद है. “मेरे लिए दुःख ये रहा… कि मैं सुख का भार उठा नहीं पाई”.

जब पुरुषों को कुछ
स्त्रियों की चाल स्वयं से अधिक
लगी तो उन्होंने ‘चाल चलन’
का हवाला देकर समाज
से निष्कासित किया।

फिर समाज ने पुराने सिक्कों की तरह
बढ़ती उम्र की स्त्रियों
को भी ‘चलन’ के बाहर कर दिया।

पर दुगनी उम्र के पुरुष
लालायित रहे
अपने से आधी उम्र
की उन लड़कियों के लिए
जिन्हें नापने भर से
वह हाँफने लगते थे।

अब जब स्त्रियों ने इस बात पर
ठहाके लगाए तो
पुरुषों ने अशोभनीय का ठप्पा
लगा कर दीवारों में क़ैद कर लिया।

दीवारें ये सब देखती रही
फिर एक दिन दीवारों ने
अपने ऊपर
पुरुषत्व बढ़ाने के विज्ञापन
चस्पा करवाये
पर हाय रे क़िस्मत
उन दीवारों पर आवारा कुत्तों
की नज़र लग गई
और विज्ञापन धुल गए।

स्त्रियाँ ता-उम्र वफ़ा ढूंढती रहीं
और पुरुष ‘काम’ की दवा..
स्त्रियाँ चाहती थीं
अपनी आत्मा को तृप्त करना
पर पुरुष सीमित रहा
अपनी दैहिक क्षुधा की दीवार लिए।


आँखों की अभिव्यक्ति
संसार की श्रेष्ठतम अभिव्यक्ति है..

आलिंगन संसार की सर्वोत्तम
चिकित्सा पद्धति है…

स्पर्श से बेहतर
कोई अनुवाद नहीं..

चुम्बन से सर्वोच्च
कोई अनुभूति नहीं…

और तुम कहते हो
प्रेम भाषा नहीं जानता..


जागते ही मेरे भीतर उग आते हैं
कितने ही खर-पतवार…
जिनका बढ़ना मेरी उर्वरता का दोहन है
और फिर चाह कर भी बचा नहीं पाती
प्रेम कविताओं की फ़स्ल को….


मेरे लिए दुःख ये नहीं रहा…
कि मैं सुख बचा नहीं पाई
मेरे लिए दुःख ये रहा…
कि मैं सुख का भार उठा नहीं पाई ।


अब तो मेरे गाल भी उठा नहीं पाते…
नमकीन पानी का भार,
पर इतना पता है…
जिस दिन मेरे अंदर का खारा झरना नदी बनेगा ना
मैं स्वतः तुम्हारी ओर मुड़ जाऊँगी

( हर्षिता मूलतः बैंकर है. हाल में विभिन्न माध्यमों पर जैसे वेब-पत्रों/ फेसबुक-पेजों/ पत्रिकाओं में छपी हुई कविताएँ चर्चा में रही है. )

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