कविता एक ढोंग है | फैज़ान खान

फ़ैज़ान ख़ान दिल्ली से हैं। उनकी पहली किताब, एक कविता संग्रह है ‘रंगों में बेरंग’ जोकि 2017 में हिंदयुग्म प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हुई थी। पुस्तक के विमोचन के बाद से पुस्तक ने दैनिक जागरण और नीलसन की बेस्टसेलर सूची में 3 बार अपनी जगह बनाई है। उनकी अगली किताब जो लघु कहानियों का संग्रह होगी, वह भी जल्द ही आने वाली है। लेखक के साथ-साथ वह एक अभिनेता भी हैं। दिल्ली में पांच साल तक थियेटर करने के बाद, वह फरवरी 2018 में मुंबई चले गए। अब तक के उनके उल्लेखनीय अभिनय कार्य बाटला हाउस और बिन्नू का सपना फिल्में हैं। वह कुछ टीवी विज्ञापनों में भी दिखाई दिए हैं।

कविता एक ढोंग है

मैं नहीं लिखूंगा कविता अब जंगलों पर
मैं लगाऊंगा एक नन्हा पौधा

मैं नहीं लिखूंगा कविता किसी स्त्री पर
मैं रोकूंगा ख़ुदको को – लोगों को उनपर तंज कसते

मैं नहीं लिखूंगा कविता इस लोकतंत्र पर
मैं करूँगा प्रयास लोकतंत्र का हिस्सा बनने का

मैं नहीं लिखूंगा कविता ग्लोबल वार्मिंग पर,
मैं करूँगा इस्तेमाल बंद प्लास्टिक बैग,बोतल का

मैं नहीं लिखूंगा प्रेम में ग़मगीन कविताएं,
मैं करूँगा प्रेम सच्चे दिल से

मैं नहीं लिखूंगा कविता समाज पर ,
मैं सुधारूँगा अपने अंदर की त्रुटियों को

मैं नहीं लिखूंगा कविता पहाड़ों ,नदियों ,जानवरों ,मज़दूरों ,गरीबों ,दुनिया,
भ्रष्टाचार, धर्म, प्रेम, इंसानियत पर,ऊपरवाले पर

मैं करूंगा बंद संग मरमर के पत्थरों ,टाइल्स का इस्तेमाल ,

करूँगा बंद जल की बरबादी करना ,

करूँगा बंद जानवरों पर अत्याचार करना ,

करूँगा बंद मज़दूरों का शोषण करना ,

करूँगा बंद गरीबों को दबाना ,

करूँगा बंद दूसरे देशों से नफ़रत करना ,

करूँगा बंद छोटी से छोटी घूस देना,

करूँगा बंद दूसरे धर्मों को झूठा समझना ,

करूँगा बंद लोगों का दिल दुखाना ,

करूँगा बंद हर चीज़ के लिए ऊपरवाले को दोषी कहना जबकि सबका ज़िम्मेदार मैं ख़ुद ही हूँ कहीं न कहीं ।

मैं अगर कर न सका ये सब

तो मेरा इन

पर कविताएँ ,कहानियाँ लिखना ,

फ़िल्म, चित्र, नृत्य, गीत , कला से कुछ भी कहना

सब कुछ एक ढोंग होगा

बहुत बड़ा ढोंग

जोकि सालों से चला आ रहा है

कला की आड़ लिए।

मुझे तरक्की पसंद नहीं

आज जब कभी फिर उन गलियों में जाता हूँ
मैं अक्सर घर का रास्ता भूल जाता हूँ

वो ऊँचे – ऊँचे मकान
वो चम-चमाती सड़के

नुक्कड़ पर से वो परचून की दुकान अब गायब हो गयी है
वो पीपल का पेड़ ज़मीन में कहीं गुम हो गया है

आंगन की मिट्टी मुझे ज़्यादा पसंद थी
फ़र्श पर अक्सर पैर फिसल जाते हैं

नलका ज़्यादा सुकून देता था
ये टंकी मुझे जचती नहीं

क्योंकि मुझे तरक्की पसंद आती नहीं

अपने ही घर का हुलिया जब बदल जाए
लाईट जाने पर झट से इन्वर्टर ऑन हो जाये

खपरैल जब छत बन जाए
देहलान में से जब तखत हट जाए

पेड़ की जगह जब कोई और लेले
मचान टूट कर जब कमरा बड़ा हो जाए

छत पर जाने के लिए जब पक्का ज़ीना बन जाए
किवाड़े से कुण्डी हट कर डोर बेल लग जाए

चारपाइयाँ जब बेड बन जाए
मच्छरदानी जब गुड नाईट बन जाए

ग़ुसलखाने में जब शावर लग जाए

रॉड जब गीज़र बन जाए

चूलाह जब गैस बन जाए
मटका जब फ्रिज बन जाए

तब मैं उदास हो जाता हूँ

पगडंडियों को सड़कों में
मैदानों को मकानों में

तब्दील होता देख
मैं उदास हो जाता हूँ

हाँ मैं स्कूल, हस्पताल, बिजली की क़िल्लत से निज़ात पाना चाहता हूँ
लेकिन किसी छोटे बच्चे की तरह
अपनी उम्र को रोक कर
अपनी छत को छत रहने देना चाहता हूँ
मैं पूरी उम्र पतंगबाज़ी करना चाहता हूँ

लेकिन अफ़सोस शहर का रंग
गाड़ियों, ट्रेनों से लद कर गाँव आ रहा है
अब उन गलियों से वो मज़ा जा रहा है

फिर किसी चबूतरे की तलाश में
कुछ दूर नज़र दौड़ाता हूँ
उसपर फूँक मार

एक लंबी आह भरता हूँ
और सोचता हूँ

कि क्या किया जाए ?
जो गाँव को गाँव रहने दिया जाए।

ख़रगोश

गर शक है मुझ पर
तो अपने आप से पूछलो
या अपने इंसान से पूछलो
नहीं गर खुदपर भी यकीं
तो अपने भगवन से पूछलो
उठ गया हो यकीन
गर उस पर से भी
तो उस बच्चे की मुस्कान से पूछलो
कहेगा वो भी यही
कि तुमने ही मारा है
उसके विशवास को
जो हो गया था हवस में ,बेनक़ाब वो
सर झुकाए ख़ुदा भी खड़ा था
जब आंसू ज़मीन से आसमान जाकर पड़ा था
हिल गया था सन्नाटा भी
कि मुझसे भी गुमसुम
ये कौन खड़ा था
था उल्टा वो शर्मिंदा
कि किया ये मैंने किस भेड़िये पर यकीन
क्या हर सदी ख़रगोश को ही मरना था ?
जंगल को पहले से ये सबकुछ पता था
तो पहले से ही क्यों नही उस बच्चे को
ये शिक्षा में मिला था
जबकि हर बार यही इतिहास दोहराया जाता था

वो अंकल,वो चाचा,वो टीचर ,वो भईया
वो साईकिल ,वो स्कूटर ,वो कोना , वो सोफा
अब तो स्कूल की ड्रेस पर भी दाग लग गया था
फिर भी सारा जंगल सुनसान ही खड़ा था
थे लेटे सिर्फ दो ,वो और खरगोश
अब तो वो उछालना भी भूल गया था
जैसे कि बिल ही बंद हो गया था
टेबल के नीचे दिमाग़ से कुछ कह रहा था
क्या तुमने वो सुना था ?

तुम सीटी – मैं कूकर

तुमने मेरे किरदार को फाका
मेरी नसों मे घुसे घुनो को छाना
मेरे खयालो पर फूका और हलके हाथ से उन्हें एक तरफ़ा करती गई
जिस्मों के निचोड़ का छोका ऐसा लगा
कि भगरने के अंतिम चरण को पाने के लिए
मैंने अपने आपको उसमें झोंक दिया
मैं पकने की ख़ुशी में
इत्मीनान से कूकर की गर्द में जाकर सुकून से बैठ गया
लेकिन तभी तुम मोहब्बत नाम की सीटी लगा कर
बालकनी से फुर्र हो गई
मैं पकता रहा, तपता रहा
सीटियों पे सीटियाँ आने लगी
सीटियों के शोर में
मैं चीख भी नही पा रहा था
जलने की बू आने लगी थी
मैं पैरो तले जलने लगा था
महक इतनी बढ़ी
कि किसी का दस्तक देना लाज़मी हो चला था
वो तो शुक्र मनाओ उनका
जिन्होंने अपने दुपट्टे से उस सीटी को नीचे कर दिया
वरना क्या-क्या होता ?
जब वो कुकर सीटी से जुदा होता
वैसे जले हुए चावल लगते बड़े लज़ीज़ है।

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