पत्र

प्रिय मित्र,
आज आपकी चिट्ठी पढ़ कर (और पहले भी कई बार अपने बारे में सोचते हुए) मुझे लगा जैसे हम जहर खाये लोग हैं और हमारी चिट्ठियाँ (या अंतरंग क्षणों में कई गई बातें )एक अजीब किस्म की केमेस्ट्री है ,जैसे एक मरता डूबता हुआ आदमी कह रहा हो -देखो, अब मेरे भीतर की नसें खींचने लगी है।


क्या इस तरह का हाल कहते-कहते हम एक दिन चुप हो जायेंगे और यह शहर जिसे अपना समझ रहे हैं दो मिनिट का मौन भी नहीं रखेगा। हमारे बाद भी हमारे दोस्त अपनी स्त्रियों से सहवास करेंगे,जबकि हमारी मृत्यु हुए अड़तालीस घण्टे भी नहीं हुए होंगे। एक दिन मैंने सोचा कि यदि आज मेरी मौत हो गई तो मेरा बच्चा मेरी उम्र हो जाने पर मेरी शक्ल ही भूल जायेगा। मैंने एक बार कहा था आपसे कि आदमी जनरल कोच का यात्री है, जो अगर दुबारा लौटे तो जगह खाली नहीं मिलती। फिर क्यो नहीं हम केवल अपने सुख के बारे में सोचते …
ख़ैर…
तुम्हारा…

{ डॉ. सत्यनारायण को उनके मित्र रघुनन्दन त्रिवेदी का पत्र }

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