तुरपाई:रफू ऑफ आर्ट। ओम नागर

तुरपाई : रफू ऑफ आर्ट /ओम नागर
टिप्पणी : विजय राही

डायरी स्मृतियों को रेखांकित करने की एक विशिष्ट पद्धति है,जहाँ कहीं किसी गद्य-विधा में एकान्त क्षणों की स्मृतियों को श्रृंखलाबद्ध करने की आवश्यकता पड़ती है,इस विधा का प्रयोग कर लिया जाता है।
अब तो इस विधा में छोटी-छोटी कविताएँ भी समाविष्ट की जा रही है। श्रीकांत वर्मा और मलयज की डायरी में भी कविताएँ दर्ज है। इससे अनुभूति और चिंतन को घनत्व प्राप्त हो जाता है।
पिछले बर्षों में युवा लेखकों ने भी डायरी विधा में बहुत अच्छा लेखन किया है। ऐसे लेखकों में युवा लेखक ओम नागर का लेखन महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय है । ओम नागर जो कि कोटा,राजस्थान के रहने वाले है। ये उम्दा कवि भी है,इन्होने सुन्दर कविताओं के साथ-साथ सुन्दर गद्य भी लिखा है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल कहते है कि गद्य कवि की कसौटी है। कवि ने इस कसौटी पर अपने को खरा साबित किया है।

ओम नागर केन्द्रीय साहित्य अकादमी के युवा पुरस्कार से भी सम्मानित है ।’निब के चीरे से’ लेखक की पहली डायरी है। इसी डायरी पर उन्हे ज्ञानपीठ का नवलेखन पुरस्कार भी मिला है। ओम नागर की “हाट “नाम से एक राजस्थानी में लिखी डायरी विधा की पुस्तक भी आई है । राजस्थानी डायरी में यह नया प्रयोग है जिस ने अपनी ओर ध्यान आकर्षित किया है ।

हाल ही में इनकी एक हिन्दी डायरी ‘तुरपाई’ क़लमकार मंच,जयपुर से प्रकाशित और चर्चित हो रही है।
‘तुरपाई’ की ख़ास बात यह है कि इसमें काव्यात्मक गद्य तो है ही कुछ ख़ूबसूरत प्रेम कविताएँ भी है।
‘ढाई आखर’ ‘वो काले तिल वाली सुंदर लड़की’ ‘धूप की तुरपाई’, ‘धूप की फेरी’ ‘ये सदाफूली का फूल’ ‘तुम्हारा साथ’ ‘तेरी संदूक’ जैसी शानदार प्रेम कविताओं से सजी यह किताब कभी-कभी कविता संग्रह सी लगती है। डायरी के बीच-बीच में प्रेम की कुछ बातों के साथ ग़ालिब,परवीन शाकिर,दुष्यंत कुमार की शाइरी है और हिन्दी,राजस्थानी के समकालीन कवि-लेखकों के दिलचस्प प्रसंग है।
लेखक ‘तुरपाई’ की शुरूआत इस तरह करता है
एक बात
जो कहनी थी तुम्हीं से
इन दिनों नहीं आ रही याद”

ओम नागर बहुत संवेदनशील कवि है। इस डायरी में ‘प्रेम की कुछ बातें ,कुछ कविताएँ’ है । जब आप पढ़ेंगे तो आपको लगेगा कि उनमें कितनी गहनता, संवेदनशीलता और सहजता है। यहाँ प्रकृति का सजीव चित्रण , मानवीय रिश्तों की उधेड़बुन, त्यौहारों का उल्लास, ऋतुओं का आलम्बन तो है ही साथ ही कवि की रेल यात्राओं की भी कई स्मृतियाँ हैं। रेल में सफर करने वाले मजदूरों, जातरुओं, प्रेमियों का इन्होने बहुत सुंदर वर्णन कर रेलयात्रा वर्णन को जीवन्त बना दिया है। ऐसा लगता है कि हम भी लेखक के साथ रेलयात्रा में है। यहाँ सफ़र भी है,बारिश भी है और स्मृतियाँ भी हैं-
उसकी याद
कठफोड़े सी
जो टीचती रहती है हमेशा
भीतर का नीम”

प्रेम के बारें में बात करते हुए लेखक अपने जुदा अंदाज में कहता है कि
“रोज छूट ही जाता है कुछ न कुछ
छूटने का क्या किसी दिन यूँ ही छूट जायेगा
देह से साँसों का साथ
तुम तो आत्मा में हो
आत्मा तो अजर अमर होती है ना प्रिये !”

इसी तरह एक बानगी और देखिए –
“यहाँ सारी संख्या सम है
बस एक तुम्हारा रूठना विषम है।”
यहाँ आप देखिए कि कितने कम शब्द इस्तेमाल किए गये है,और कितनी बड़ी बात कह दी है।

यूँ तो डायरी में बारिश और सर्दी की अधिकता है,पर यहाँ वहाँ ग्रीष्म और बसंत की ताक-झाँक भी है।
“बहुत उदास है उस खेत किया मिट्टी
जिसकी मेड़ पर बनाएँ थे कभी गीली गार के घरौंदें
सूख गई तुम्हारे जूड़े में टाँगी गेहूँ की बालियाँ”

बरसात के कई रूप इस डायरी में देखने को मिलेंगे। कभी रिमझिम जो प्रेमियों के चेहरे खिला देती है तो कभी वियोग की बारिश भी है।
एक कविता में बारिश की बूँदों के कोरस के साथ नायिका गाती है-
“भँवर थाँकी बादली नै म्हारों
लहरियों भजोयौ जी राज ।”

इसके विपरित ‘एक उदास लड़की का सफ़र और बारिश’ जैसा
अलहदा किस्सा भी है।

लेखक पाठक को लोक सौन्दर्य का अनुभव लोक भाषा में ही करवाता है। लोक शब्दों को
सहज रूप से बरता गया है। कुछ लोक शब्द देखिए-
हेत,दड़बा,गार,जातरी,बाथभर,पगथली,सपड़ाव,उलीच,जोरी जबरी आदि।

डायरी में दर्शन की गहराई और विश्वव्यापी चिन्तन इसको लोक के साथ ग्लोबल बनाती है।
बीच बीच में सुन्दर जीवन रस से भरपूर कविताएँ हैं ,जो डायरी में चार चाँद लगा देती है।इसमें कोई दोराय नही है कि ये कहानी,कविता,कथेथर का आनन्द अनुभव एक साथ करवाती है। इस तरह के नये लेकिन रोचक प्रयोग से लेखक ओम नागर की साहित्यिक चतुराई का पता चलता है।

डायरी की भाषा कसावट लिए हुए है। ओम नागर सधे हुए लेखक है, सो उन्होने यहाँ पाठक को निराश नही किया है। वो पाठक जो कविता पढ़ना ही पसंद करते है,गद्य नही पढ़ते है,वो भी ये डायरी पढ़कर निराश नही होंगे,क्योंकि यह डायरी अच्छा काव्यत्मक गद्य है।

काव्यात्मक गद्य का एक नमूना देखिए-
“ये ‘सफेदे’ के पत्तें भी कितने बड़े और तीखे होते हैं। वैसे ही जैसे तुम कभी-कभार आँख में काजल की बारीक रेख खींच लेते थे। आँख की असल कमान यही होती है शायद,जहाँ से नज़रों के तीर चलतें हैं।”

डायरी 96 पेजों में छपी है। शानदार कवरपेज है और कागज बहुत स्तरीय है। यह कलमकार मंच,जयपुर से प्रकाशित है।डायरी पेपरबैक में है, मूल्य 150 रूपये है। यह अमेजन पर उपलब्ध है,आप सीधे कलमकार मंच से भी मँगा सकते है। आख़िर में ‘तुरपाई’ से ही एक कवितांश के साथ-साथ ओम नागर को इस बेहतरीन किताब के लिए हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं
“मैं देना चाहता हूँ तुम्हें
थोड़ी-सी हिम्मत
थोड़ा-सा विश्वास
थोड़ा-सा हठ
बस काफ़ी है तुम्हें
अपने जैसा बनाने के लिए

◆ विजय राही

2 विचार “तुरपाई:रफू ऑफ आर्ट। ओम नागर” पर

  1. “बहुत उदास है उस खेत की मिट्टी
    जिसकी मेड़ पर बनाएँ थे कभी गीली गार के घरौंदें
    सूख गई तुम्हारे जूड़े में टाँगी गेहूँ की बालियाँ”

    This line left such an impression. Subhanallah

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