“आदमी”- प्रणव मिश्र

ख़याल साथ भी रहे ख़याल दूर भी रहे।
के ज़िन्दगी के साथ मौत का सुरूर भी रहे।خیال ساتھ بھی رہے خیال دور بھی رہی
کہ زندگی کے ساتھ موت کا سرور بھی رہےक़दम बढ़ें तो साथ में ख़ुदा का नूर भी रहे।
क़दम रुकें कहीं तो याद में वो तूर भी रहे।قدم بڑھیں تو ساتھ میں خدا کا نور بھی رہے
قدم رکیں کہیں تو یاد میں وه تور بھی رہےहमें हो क्या ग़रज़ जहां हमें किसी भी तौर ले।
हमारी अक़्ल में ख़ला का इक फ़ुतूर भी रहे।ہمیں ہو کیا غرض جہاں ہمیں کسی بھی طور لے
ہماری عقل میں خلا کا اک فتور بھی رہےहक़ीक़तें तमाम ख़्वाब ख़्वाब सब हक़ीक़तें।
हवा के लम्स में अगर वो ज़ुल्फ़े-हूर भी रहे।حقیقتیں تمام خواب خواب سب حقیقتیں
ہوا کے لمس میں اگر وه زلفی-ہور بھی رہےमुझे वो बुत-शिकन कहे या बुत-परस्त आदमी।
मैं आदमी हूँ मेरी ज़ात में क़ुसूर भी रहे।مجھے وه بت شکن کہے یا بت پرست آدمی
میں آدمی ہوں میری ذات میں قصور بھی رہے- प्रणव मिश्र ‘तेजस’

एक उत्तर दें

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s