मूर्ति में टिक जाऊँ तो रुक जाऊँगा | आलोक रंजन

यह अच्छा ही है कि एक वक़्त के बाद लोग मुझसे विरक्त हो जाते हैं । उनकी मुझे लेकर जो बनायी गयी मूर्ति है वह टूटती है । यानि मैं उनकी मूर्ति में ज्यादा देर नहीं टिकता । मूर्ति में टिक जाऊँ तो रुक जाऊँगा । हजारी प्रसाद द्विवेदी शिरीष के फूल निबंध में इस स्थिति को मृत्यु कहते हैं । उनके हिसाब से गतिशीलता होनी चाहिए , आगे बढ़ते रहना चाहिए । लोगों की मूर्ति टूटती है , वे विरक्त होते हैं , वे जाते हैं या जाने लगते हैं या फिर जाने की चेष्टा में होते हैं । दिखता है मुझे भी । चाहूँ तो रोक लूँ लेकिन , किसी को रुकने के यदि बहाने नहीं हैं तो प्रयास से बात बस टल सकती है । वैसे भी अपने कविवर निराला वह सूत्र वाक्य दे ही चुके हैं – प्रगतिशील को कौन रोक सकता है ।

मैं किसी से मिलने बहुत सज धजकर नहीं जाता । अपनी ढीली छवि ही मिलती है लोगों को अँग्रेजी में क्लम्जी ! एक थका हुआ चेहरा मेरा यूँ भी बना ही रहता है । मुझे लोगों को दूर करने के बहाने नहीं चाहिए होते । थके चेहरे को भूमिका की जरूरत नहीं पड़ती । वह अपने आप में शाश्वत भूमिका है और स्वयं ही अंतिम कथ्य ! लोग पढ़ते हैं और आगे बढ़ते हैं । इन सबसे एक उदासी होती है लेकिन यह भी एक बात है कि उदासी ही स्थायी है । आप उदासी से दूर हो सकते हैं । भीड़ में जा सकते हैं लेकिन उदासी ऊर्जा देती है । ग़ालिब यदि विपस्सना कर लेते तो शायद ग़ालिब नहीं रहते !

मैंने देखा है लोगों को इमेज कोंशस होते हुए । लेकिन उसका क्या करेंगे । आप अपनी इमेज बनाइये कोई यदि तोड़ने पर आएगा तो तोड़ ही डालेगा । आप भले ही एक बेहतर प्रधानमंत्री रहे हों लेकिन किसी के पास पैसा होगा तो आपकी सारी प्रतिष्ठा धूल धूसरित होकर रहेगी । आप पर फिल्म बनेगी, भौंडे संवाद कहे जाएंगे । लेकिन मैं इस डर से अपनी इमेज को लेकर बेफिक्र नहीं रहता ! मैं इसलिए बेफिक्र रहता हूँ कि मुझे पता है मैं क्या हूँ और मेरी सीमा क्या है ! एक बार पास की ताड़ी की एक दुकान से मैं निकल रहा था तो बंगाल से यहाँ काम करने आया एक लड़का मुझे देखकर कर कहने लगा कि आप भी यहाँ आते हैं ? मैंने कहा भाई मैं यहाँ आता तो हूँ लेकिन ताड़ी पीने नहीं । उसने नहीं माना । मैंने उसे समझाने की कोशिश भी नहीं की । किसी ने यदि मेरी किताब #सियाहत पढ़ी है तो उसमें जो मलयालम भाषा के कवि ओएनवी कुरूप वाला हिस्सा है उसे पढ़कर समझ सकते हैं कि ताड़ी की दुकानों पर भटकाव ने मुझे क्या दिया । केरल के ताड़ी की दुकानें शानदार मांसाहारी खाद्य पदार्थों के लिए प्रसिद्ध हैं ।

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