न हो कमीज़ तो पाँव से पेट ढँक लेंगे | आलोक रंजन

आजकल जहाँ भी विद्यार्थियों की बात हो छूटते ही लोग कहने लगते हैं – विद्यार्थियों को लड़ने – झगड़ने , विवाद में पड़ने और सरकार से उलझने की क्या जरूरत है … वे तो पढ़ने जाते हैं चुपचाप पढ़ाई करें , विद्यार्थी ऐसे करेंगे तो उनके खिलाफ़ बल प्रयोग होना ही चाहिए … उन्हें अनुशासन में रहना चाहिए वगैरह । देश भर में यह सब आम धारणा का रूप ले चुका है । इसके पीछे दो-तीन चीजें एक साथ काम करती हैं । सबसे पहले तो विद्यार्थियों को ‘बच्चा’ समझने का मनोविज्ञान फिर राजनीति को बेकार चीज समझने की आदत और फिर आता है आम फहम दिक्कतों की ज़िम्मेदारी किसे दी जाए उसे न समझ पाना ! अंतिम दो एक दूसरे से जुड़े हुए हैं ।

अक्सर यह देखा गया है कि विद्यार्थी को परिपक्व सोच वाला पूर्ण मनुष्य नहीं माना जाता । सामान्यतः यह मान लिया जाता है कि उसकी अपनी कोई समझ नहीं है और उसे आसानी से बहला – फुसला लिया जा सकता है । लेकिन देखने की बात यह है कि एक छोटा बच्चा भी पूर्ण मनुष्य है वह अपने व्यवहार अपनी समझ के हिसाब से ही करता है । हाँ अनुभवों से विस्तार आता है उसकी कमी हो सकती है । स्कूल – कॉलेज या फिर विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले विद्यार्थी अपनी एक परिपक्व समझ रखते हैं और वे अपनी समझ का अपने समाज को बदलने के लिए उपयोग करते हैं यह खुशी की बात है । लेकिन इसका विरोध होता है क्योंकि यह बुजुर्गों की सत्ता को चुनौती देने वाली बात है , विद्यार्थी जिन्हें कि वे ‘बच्चा’ मानते हैं वे उनके ‘हाथ से निकल’ जाता है ।

माँ – बाप अक्सर अपने बच्चों के ‘हाथ से निकल’ जाने की शिकायत करते पाये जाते हैं । मतलब कि माँ –बाप का नियंत्रण बना रहे और उसके माध्यम से उस समाज का नियंत्रण बना रहे जिससे वह आता है । यदि समाज ब्राह्मणवादी है तो परिवार के माध्यम से वह उन मूल्यों को बच्चों तक हस्तांतरित करेगा और यदि बच्चे ने पढ़-लिखकर उससे टकराने की कोशिश की तो उसे दबाने से लेकर उसके बहिष्कार तक का होना बहुत आसानी से भारतीय समाज के किसी भी हिस्से में आसानी से देखा जा सकता है । ऐसा समाज पढ़ाने वाले संस्थानों से बस यही चाहता है कि वह वही सिखाये जो विद्यार्थी को समाज के दायरे से बाहर जाकर सोचने को विवश न करे और वह सीखकर समाज में ही लौट आए उन्हीं मूल्यों को आगे बढ़ाए जो समाज अब तक आगे बढ़ाता आ रहा है । इसीलिए ऐसे संस्थान निशाने पर होते हैं जहाँ होने वाली आम बहसों के माध्यम से विद्यार्थियों के विचार में परिवर्तन होना स्वाभाविक हो जाता है । यदि संस्थान यह सिखाते हैं कि सभी बराबर हैं तो जाति – व्यवस्था के पोषक उससे नफरत करने लगते हैं ।

भारत में राजनीति ने जिस तरह का चरित्र ग्रहण किया उसे देखते हुए आम लोग इससे दूर रहना चाहते हैं । ऐसा कहना कि राजनीति आज भ्रष्ट और पूंजीवादी हुई है, बड़ी भूल होगी । आज़ादी के ठीक बाद से ही यह सब स्पष्ट होने लगा था । उत्तरोत्तर इसने वर्तमान स्वरूप ग्रहण कर लिया जहाँ राजनीति आम लोगों का काम न रहकर कुछ ऐसे लोगों का काम बन गयी जो येन-केन-प्रकारेण भीड़ इकट्ठी कर सकते हैं । आज राजनीति करने वाले गड़रिये के वे कुत्ते होते हैं जो भेड़ों को हंकालकर घेर सके और घेरे रख सके । इस क्रम में हिंसा होती है , बाहुबल और धनबल आता है । बाहुबल और धनबल के एक साथ मिल जाने से राजनीति आम से दूर होती गयी । बल्कि इसके अपनी प्रक्रियाओं में आमलोगों की भूमिका को सीमित कर दिया । अब राजनीति में आम लोगों की भूमिका बस वोट देने तक सीमित है । उसके बाद यदि वे प्रतिरोध करते हैं , किसी बात को नकारते हैं तो वह सत्ता को स्वीकार्य नहीं होता है । उसका दमन शुरू हो जाता है । पहले से डराकर घेरी गयी भेड़ें दमन के बाद और डर जाती हैं । फिर उन्हें अपने घर के लड़के लड़कियों का राजनीति में आना या पड़ना और डराता है । जो संस्थान लोकतांत्रिक मूल्यों को अपने में समाहित किए हुए हैं वहाँ राजनीतिक समझ बड़ी आसानी से विकसित होने लगती है और फिर भेड़ों के झुंड से कुछ भेड़ें कुत्ते तो छोड़िए गड़रिये के खिलाफ ही खड़ी हो जाती हैं । ऐसी कुछ भेड़ों दोतरफा हमले की शिकार हो जाती हैं ।

‘कोऊ नृप होंही हमें का हानी’ वाले देश के नागरिक हैं हम । हम घटते रोज़गार, बढ़ती मंहगाई, बदतर स्वस्थ्य सेवा, खराब शिक्षा, संसाधनों की कमी जैसी बातों के साथ जीना सीख गए हैं । इन पर सवाल उठाने के बजाय हम इन्हें स्वीकार करते हुए चलते हैं । दुष्यंत कुमार ने इस स्थिति को बड़े ही मारक अंदाज़ में लिखा है –

न हो कमीज़ तो पाँव से पेट ढँक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए ।

अपने हक़ के लिए खड़ा होना तो दूर हक़ को हक़ समझने तक के लिए तैयार नहीं हैं हम । हम इसे अपनी नियति मानकर स्वीकार करते हुए चलते हैं और यह मान लेते हैं कि हमें रोज़गार हमारी कमियों की वज़ह से ही नहीं मिल रहा है । ऐसे देश में जब लोगों के इस अवस्था में रहने से चंद अवसरवादी, पूँजीपतियों को बम्पर मुनाफ़ा और सत्ता हासिल होती है तो लोगों का इस अवस्था से बाहर आना खलेगा ही । इसीलिए पूंजी से , पूंजी के द्वारा और पूंजी के लिए बनी यह राजनीतिक व्यवस्था अपने सभी उपक्रमों का सहारा लेकर दमन करने निकल पड़ती है । अंग्रेजी में कहते हैं न ऑल गन्स ब्लेज़िंग वही ।

छात्र राजनीति का चमकदार इतिहास :

आज़ादी के आंदोलन में विद्यार्थियों की भूमिका को बाद करके भी चलें तो भारत में छात्र राजनीति का लंबा इतिहास रहा है । डेढ़ – दो सौ बरस पहले से ये झोला लेकर चलने वाले , बहस करने वाले लोग अपनी समझदारी से देश की राजनीति को ठोंकते पीटते चले आ रहे हैं । इसने 19वीं सदी के बंगाल में पुनर्जागरण में भूमिका निभाई । 1920 में लाहौर के किंग एडवर्ड मेडिकल कॉलेज में ब्रिटिश और भारतीय विद्यार्थियों के बीच होने वाले भेदभाव के खिलाफ देश की पहली छात्र हड़ताल हुई थी । सन पैंसठ में दक्षिण भारतीय राज्यों पर हिन्दी थोपने के खिलाफ तमिलनाडू में आंदोलन हुआ और बाद में देश भर त्रिभाषा सूत्र लागू हुआ । गुजरात का सन तिहत्तर – चौहत्तर का वह छात्र आंदोलन जिसने राज्य सरकार गिरा दी , अहमदाबाद में सेना बुलानी पड़ गयी । 1974 के बिहार के विद्यार्थियों के आंदोलन को ही जेपी आंदोलन कहा जाता है । जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में छात्र संघर्ष समिति ने समाजवाद के उद्देश्य को लेकर जो संघर्ष किया वह आज के भारत को आज भी प्रभावित कर रही है । आपातकाल के दौरान देश के विभिन्न भागों में छात्र आंदोलन हुए । असम गणपरिषद की अप्रत्याशित सफलता छात्र आंदोलन से ही आयी । फिर दो ऐसे आंदोलन भी आए जो सामाजिक न्याय के खिलाफ थे जैसे 1990 का मण्डल कमीशन विरोधी आंदोलन और 2006 का शैक्षिक संस्थाओं में ओबीसी को दिए गए आरक्षण के खिलाफ विरोध । 2014 में बंगाल के जाधवपुर विश्वविद्यालय में निहत्थे विद्यार्थियों पर हुए पुलिस के हमले के विरोध में बड़ा आंदोलन हुआ था । 2015 में एफ़टीआईआई का 140 दिन लंबा प्रतिरोध किसे याद नहीं होगा । देश भर से उस आंदोलन को समर्थन मिला था । 2016 का जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय किसे याद नहीं होगा ! उस विश्वविद्यालय पर प्रकट और अप्रकट जितने भी हमले आज हो रहे हैं उन पर इस साल की छाप बहुत गहरी है । इन सबके साथ यदि रोहित वेमुला याद नहीं किए जाएंगे तो भारतीय छात्र राजनीति का कोई भी जिक्र अधूरा ही रहेगा । उनकी मौत और उनकी चिट्ठी सत्ता के खिलाफ़ खड़े होने वालों के लिए ऐतिहासिक महत्व रखते हैं । फिर आता है हमारा वर्तमान समय । आजकल अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय , जामिया , दिल्ली विश्वविद्यालय , बीएचयू आदि कौन से ऐसे संस्थान नही हैं जो सड़क पर हैं ।

अपने इतिहास से प्रेरणा लेकर ये विद्यार्थी सड़क पर हैं । इन्हें राजनीति से संचालित कह देना उतना ही बड़ी भूल है जितनी कि यह मानना कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है । आज के दौर में जब विपक्ष खत्म है या फिर यह कह सकते हैं विपक्ष भी सत्तापक्ष का ही एक रूप है तब विद्यार्थियों का इस तरह आगे आना सुखद और प्रशंसनीय बन जाता है । उन्होने अपने समाज को देखकर ही सड़क पर आना चुना है उन्हें हर संभव सहयोग देंगे तो देश की राजनीति में उनकी दखल बढ़ेगी । यह दखल राजनीति के लिए सुखद होगी । राजनीति अपना सर्वसमावेशी चरित्र भारत में ग्रहण ही नहीं कर पाया जिसकी बात अंबेडकर करते थे । जितने ज्यादा से ज्यादा लोग राजनैतिक प्रक्रियाओं में लगातार शामिल होंगे राजनीति उतनी ही लोकतांत्रिक होगी । कभी प्लेटो ने कहा था – ‘सार्वजनिक मसलों से दूरी की कीमत बुरे आदमी द्वारा शासित होकर चुकानी पड़ती है’ । इसलिए सार्वजनिक मुद्दों पर जो विद्यार्थी सड़क पर हैं उनके हाथ मजबूत करने का यह समय है इससे लोकतन्त्र मजबूत होगा ।

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