भविष्य | आशीष बिहानी

१.

हम घुटनों में सर दिए बैठे रहेंगे

घुटनों में सर दिए दिए ही हम बनाएँगे बाँध
बनाएँगे दीवारें, बाड़ें, और खाइयाँ
भूल जाएँगे कई दशकों तक
बंद कमरों में हिलोरें मारती मूर्तिमान विश्रृंखलता को
तल पर इकठ्ठा होते अवसाद को

फिर एक दिन फूटेगा घड़ा हमारी नासमझी का
बह जायेंगे समाज, देश, धर्म, कानून और कम्पनियाँ
समुन्दर होगा झपेड़े मारता
“वैश्विक गाँव” के थोबड़े पर

टूटे-फूटे सोचना बंद कर चुके दिमाग़ों
को लिए
हम माँग रखेंगे, अपनी जगह वापस पाने की,
आदिवासी होने के हक़ की

ऐसी माँगों का क्या हश्र होता रहा है,
यह हम बेहतर जानते हैं.

२.
अंतरिक्ष में किसी अदृश्य गाँठ
से बंधे अरबों हाथ
पत्थर ढ़ोते रहे इस उम्मीद में
कि कोई देखेगा उनके करतब
याद रखेगा दिशा
आने वाली पीढियों के लिए
एक के ऊपर एक पत्थर रखेंगे
बनायेंगे पहाड़
और छू लेंगे आसमान

फिर भी हम चलते हैं इतिहास की गलियों में
लड़खड़ाते दिशाहीन

दूरी: सौ योजन,
विस्थापन: शून्य.

३.
जलती बत्तियों, मोहब्बतों और मुर्दों को
भूलना महत्वपूर्ण हुआ करता है
दुनिया के कई भुला दिए गए कोनों में अभी भी

पेड़ों से पत्तियां, जानवरों के शरीरों से फर
बर्फ़ के क्रिस्टल, बालू के कण
पके हुए और विरक्त
गिरते हैं
सुनसान ब्रह्माण्ड में धमाके करते
धरती की धड़कनों जैसे
खो जाते हैं
वक़्त की परतों में घुटते

पर अब
सड़कों, गलियों, चौबारों के नीचे बहता है
डेटा का महाप्रवाह
हमारे क़दमों तले
लेथ के पुर्जों की तरह
समेटता गुजरे क्षणों को
एक फीड में हमारे सामने उंडेल देता है
सब जानकारी

इस बीच हम वो भूल गए
जो हमें याद रखना था.

४.
अपनी गुफाओं में
व्यक्ति से खिर कर पदार्थ बने लोग
तब भी उकेरेंगे चित्र
जब वो भूल जायेंगे सब कुछ स्मरणीय
और याद रखेंगे ओढ़े हुए सत्य

ढूंढेंगे मोहेन्जो-दारो की नाचती लड़की में
पूर्वजों को, और पाएंगे सिर्फ़
कही हुई, गढ़ी हुई बातें .

आशीष बिहानी, वर्तमान में कोशिकीय एवं आणविक जीव विज्ञान केंद्र, हैदराबाद में पीएचडी कर रहे हैं. इस कविता में मशीनीकृत, कृत्रिम बुद्धिमत्ता की दुनिया में इंसानों के प्रयोजन पर आते संकट और उनकी पहचान के अर्थ पर संभावनाएं व्यक्त कीं हैं — जिसका सरोकार हमारे साहित्य और सोशल मीडिया आदतों, दोनों से है.

“भविष्य | आशीष बिहानी” पर एक विचार

  1. “जहाँ ना पहुंचे रवि वहाँ पहुंचे कवि” वाली कहावत को आशीष ने फिर से प्रमाणित किया है। विज्ञान, राजनिति जैसे विषयों से संबंधित तत्कालीन घटनाओं के दूरगामी प्रभाव की कल्पना एक कवि ही कर सकता है। आज भी हम बहुत सारे का घुटनों में सिर दबाये ही करते हैं। व्यापार चलने के लिए, ऑफिस का का करने के लिए, खाने, यात्रा आदि की व्यवस्था करने के लिए, दोस्ती, रिश्ते, सामाजिक दायित्व निभाने के लिए घुटनों में ही सर दबाये रहते हैं।
    आपने इस सच्चाई को बहुत सलीके से परोसा है कि हम वो भूल गए जिसे मनुष्य होने के नाते हम याद रखना था।
    आने वाले युगों की बहुत ही सटीक भविष्यवाणी।
    शुभाषीश

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