फ़िल्म ‘ख़ारिज’ पर आलोक रंजन का भाव

फिल्म में पालान अनुपस्थित रहता है । उसकी यह अनुपस्थिति ही फिल्म ईंधन है । इसी के माध्यम से यह तमाम दार्शनिक , समाजशास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक पहलुओं से मुठभेड़ करती है । ऊपर से देखने पर फिल्म जितनी साधारण लगती है उतनी ही वैचारिक रूप से मजबूत । अनुपस्थित का होना इतना प्रभावी है कि उसी के माध्यम से भावनाओं और आपसी सम्बन्धों की मजबूती और टूटन को देखा जा सकता है । किराएदार और मकान मालिक , पति और पत्नी , रिश्तेदार , आसपास के अन्य लोग जो उसी सामाजिक स्तर के हों सबके मूल चरित्र को स्पष्ट करने वाला तत्व यह अनुपस्थित ही है । असल में मृणाल की तीन फिल्में ‘एक दिन प्रतिदिन’ , ‘ख़ारिज़’ और ‘एक दिन अचानक’ अनुपस्थिति की त्रयी है । इन तीनों ही फिल्मों में अनुपस्थित जिस शिद्दत से आधार बनाता है वह देखना रोचक है । अनुपस्थिति का विज्ञान मृणाल के अलावा किसी अन्य फ़िल्मकार ने नहीं समझा ।

मृणाल सेन की फिल्म ‘ख़ारिज़’ देखी । किसी यात्रा से लौटकर आते ही एक गंभीर फिल्म देखने का अपना पहला तजुर्बा था । साधारणतया मैं ऐसा नहीं करता क्योंकि यात्राएँ जो अनुभव देती हैं उन्हें समेटने सहेजने में शुरुआती दिन लग जाते हैं । बहरहाल फिल्म !

यह फिल्म मध्यवर्ग को उरियाँ खड़ा कर देती है । यह एहसासे – उरियानी पूरी फिल्म देखने के बाद एक तमाचे की तरह लगती है । अलग अलग मुखौटों में छिपने की उसकी कोशिश को अपने हर हिस्से में नाकाम करती हुई चलती है । भारतीय फिल्में साधारणतया इस वर्ग से नहीं उलझती और लगभग सभी मामलों में इसी की भावनाओं को हवा देती हुई चलती हैं । फिल्म ख़ारिज़ आरंभ से ही एक द्वंद्व लेकर चलती है । एक तरफ वे लोग हैं जिन्हें ‘भद्रलोक’ कहा जाता है दूसरी ओर वे इन भद्रलोकों की सेवा कर के अपना जीवन चलाते हैं जिनके घरों में कुछ नहीं होता । यह एक आम सी बात है लेकिन फिल्म के माध्यम से मृणाल जो दिखाना चाह रहे हैं उसे देखने की जरूरत है । फ्रेंच समाजशास्त्री ‘पियरे बोर्दियु’ ने एक सिद्धांत दिया था – ‘कल्चरल कैपिटल’ का । इसकी मोटामोटी बात ये है कि सामाजिक स्थिति से ज्ञान , व्यावहारिक समझ और कौशल आदि निर्धारित होते हैं । भारत में यह ऐसी चीज है जो केवल आर्थिक हैसियत से नहीं आती । अधिकांश मामलों में जातीय श्रेणीक्रम भी इसके निर्धारण में सहायक होता है । इस दृष्टि से देखें तो फिल्म के भद्रलोक को जो हासिल है वह उनके नौकरों को हासिल नहीं । अपने नौकर की मृत्यु के बाद के ‘पचड़े’ से बचने के लिए मालिक और उसके आसपास के लोग जो तिकड़म करते हैं वह उनके भद्रलोक के आवरण को क्षत –विक्षत कर देता है । इन भद्रलोकों के पास हर तरह की पहुँच है और ये उसका फायदा उठाने से नहीं चूकते । मृणाल की यह फिल्म बड़े ही मारक अंदाज़ में यह कार्य करती हुई चलती है ।

ख़ारिज़ जटिल मनोभावों की फिल्म है जो दर्शक को परेशान करती है । परेशान इन मानों में कि , फिल्म देखने के बाद जो प्रश्न बनते हैं वे एक रेखीय नहीं हैं । उसका जो असर रहता है उसे किसी एक स्तर पर नहीं रखा जा सकता । फिल्म अपने प्रभाव में कई बहसों को जन्म देती है । बाल मजदूरी को एक सामाजिक बुराई मानना एक नौकर की मौत के लिए उसके ‘मालिक’ को दोषी मानने से रोकता है । यह द्वंद्व दर्शक बहुत गहरे से महसूस करता है । यदि सामाजिक ज़िम्मेदारी न होती तो इन मामलों में व्यक्ति को दोषी माना जा सकता था । लेकिन फिल्म समाज के उस यथार्थ को सामने खड़ा कर देती है जिसमें 12 – 13 साल के बच्चे को नौकर रख लेना आम बात है । उसके साथ तीसरे तर्जे के मनुष्य जैसा व्यवहार न करना आश्चर्यजनक बात हो सकती है । उसे ठंड में ठिठुरते हुए भी गद्दा न देना , गरम कपड़े न देना अलग बर्तन में खिलाना , अलग सा भोजन देना इतनी आम बात है, कि इन सबको घरेलू कामों में मदद करने वालों के लिए तय मानक मान लिया गया है । इसके लिए व्यक्ति दोषी नहीं है और समाज तो भीड़ है उसे सजा नहीं दी जा सकती इसलिए इस स्थिति के लिए कोई भी दोषी नहीं होता और पीड़ित की हालत लगातार वैसी ही बनी रहती है । मालिक और नौकर का यह भेद बना ही रहता है बेशक काम वह सबसे ज्यादा करे ! यहाँ यह बात ध्यान देने की है कि , मृणाल ठीक शेक्स्पीयर की तरह दर्शक के दिमाग से खेलते हैं । मेकबेथ की तीन भूत की भविष्यवाणी डंकन को दोषी मानने ही नहीं देती । मृणाल फिल्म में जो दिखाते हैं वह भद्रलोक का सामान्य चरित्र है जिससे दर्शकों का आम परिचय है , दर्शक पहले से मानकर चलता है कि यह तो साधारण बात है इसके लिए कोई दोषी नहीं ।

फिल्म दो स्थानों पर रोंगटे खड़े देती है । पहली बार ऐसा गद्दा निकालने के मामले में होता है । पालान की मौत हो चुकी है और उसके पिता इस बात से अनजान उसकी तंख्वाह लेने आते हैं । यहाँ पता चलता है कि उनके बेटे की मौत हो चुकी है लाश अब तक पुलिस के पास ही है । वे अपने बेटे के मरने की जगह यानि कि रसोईघर में ग़मगीन बैठे हैं । बाहर इस झंझट से उबरने की तिकड़में चल रही हैं । रात को उनके रुकने का प्रबंध किया जाना है । उसे सोने के लिए गद्दा दिया जाना है । पालान जिस परिवार के पास नौकर था उसके पास गद्दा है उनके मुख्य बिस्तर के सबसे नीचे । वह गद्दा निकाला जाता है । गद्दे का निकलना बहुत प्रतीकात्मक है । ऐसा लगता है कि मध्यवर्ग अपना वह अधिकार दे रहा हो जिसे दबाकर बैठा था । गद्दा जिस मुश्किल से निकलता है वह सारी बातें अपने आप में कह देता है । इसके बावजूद गद्दे के निकलते ही ममता फूट फूटकर रोने लगती है । यहाँ दूसरी बात यह भी है कि गद्दा परिवार के लिए बेकार ही था लेकिन ज़िंदा पालान को नहीं मिला । ऐसा होता तो कहानी ही दूसरी होती । रोंगटे खड़े करने वाली दूसरी बात फिल्म के अंतिम दो मिनट में आती है । मतलब अंतिम दृश्य में । पालान के पिता और उसके गाँव के अन्य लोग शमशान से वापस लौटते हैं तो सीधे उस घर में आते हैं जिसमें उसकी मृत्यु हुई थी । आधी रात के बाद उनका इस घर में आना अलग ही तरह के अंदेशा लिए होता है लेकिन वे बस शमशान से लौटकर आने के कर्मकांड पूरे करने की मांग करते हैं । उसके बाद चले जाते हैं । जाने से पहले जिस तरह पालान के पिता सीढ़ी पर चढ़ते हैं और ऊपर वाले परिवार के नौकर हरी के सिर पर हाथ रखते हैं वह हृदय विदारक होने के साथ साथ डराने वाला भी है । उनका हरी के सिर पर हाथ रखना इस बात का प्रतीक है कि वे शायद अब कभी न मिलें , उन्हें नहीं पता कि आगे उनका या हरी का क्या होगा !

फिल्म में पालान अनुपस्थित रहता है । उसकी यह अनुपस्थिति ही फिल्म ईंधन है । इसी के माध्यम से यह तमाम दार्शनिक , समाजशास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक पहलुओं से मुठभेड़ करती है । ऊपर से देखने पर फिल्म जितनी साधारण लगती है उतनी ही वैचारिक रूप से मजबूत । अनुपस्थित का होना इतना प्रभावी है कि उसी के माध्यम से भावनाओं और आपसी सम्बन्धों की मजबूती और टूटन को देखा जा सकता है । किराएदार और मकान मालिक , पति और पत्नी , रिश्तेदार , आसपास के अन्य लोग जो उसी सामाजिक स्तर के हों सबके मूल चरित्र को स्पष्ट करने वाला तत्व यह अनुपस्थित ही है । असल में मृणाल की तीन फिल्में ‘एक दिन प्रतिदिन’ , ‘ख़ारिज़’ और ‘एक दिन अचानक’ अनुपस्थिति की त्रयी है । इन तीनों ही फिल्मों में अनुपस्थित जिस शिद्दत से आधार बनाता है वह देखना रोचक है । अनुपस्थिति का विज्ञान मृणाल के अलावा किसी अन्य फ़िल्मकार ने नहीं समझा ।
फिल्म की प्रतिकात्मकता बड़ी सजीव और तीक्ष्ण है । फिल्म में बार बार रज़ाई को दिखाया जाता है । फिल्म कहीं भी रहे लेकिन लौटकर रज़ाई पर आती है । उसका इस तरह रज़ाई पर आते रहना भद्रलोक की उस कल्चरल को बार बार फोकस में लाना है जो भद्रलोक बार बार प्रयोग में लाते हैं । गद्दे के मामले में भी वही बात है । जो लोग आर्थिक आधार पर आरक्षण के समर्थक हैं उन्हें यह फिल्म जरूर देखनी चाहिए । क्योंकि फिल्म बार बार यह बताती है कि ऐसी बहुत सी चीजें हैं जो केवल पैसे से नहीं आ सकती । जातीय उच्चता कम से कम सामाजिक रूप से एक प्लेटफॉर्म तो देती ही है । इस फिल्म में ‘हैव्स’ और ‘हेव नोट्स’ के बीच केवल पैसे की बात नहीं है उसके अलावा और भी बहुत कुछ है जो दोनों के बीच में अंतर पैदा करती है । प्रतीकों को बरतने में मृणाल विलक्षण हैं ।

ख़ारिज़ के स्त्री चरित्रों पर बात करना बेहद जरूरी लगता है । वे वर्गीय चरित्र हैं । मध्यवर्गीय स्त्री की विशेषताओं से लदी वे स्त्रियाँ उसी तरह व्यवहार करती हैं । वे सामान्य मानवीय समवेदनाओं से ज्यादा अपनी वर्गीय विशेषताओं को ही अभिव्यक्त करती मिलती हैं । उनकी रुचि – अरुचियाँ , हंसी मज़ाक और मन बहलाव सब उनके अपने पोजीशन से ही जुड़े हैं । मृणाल ने इस चारित्रिक भाव को व्यक्त करने में जिस कौशल का परिचय दिया है वह उनकी गहरी समझ को व्यक्त करता है । श्रीला जिस तरह से पालान की मौत के बाद भी बच्चे के साथ पालान को लेकर हंसी मज़ाक करती है वह उस वर्गीयता का वीभत्स रूप है । श्रीला के साथ के दृश्यों में मृणाल इस भाव को चरम पर खड़ा किए हुए रहते हैं ।

यह फिल्म इतनी गहन है कि , देखते हुए तकनीक की ओर ध्यान भी नहीं जाता । यहाँ तक कि , अभिनय , कैमरा , बैक्ग्राउण्ड स्कोर आदि कुछ भी देखने समझने का अवकाश नहीं मिलता । इस स्थिति के बावजूद फिल्म में जब पालान के पिता की स्थायी आमद होती है तब अभिनय अपने चरम पर होता है । पालान के पिता की भूमिका निभाने वाले अभिनेता ने जिस शिद्दत के साथ उस चरित्र को जिया है वह अद्भुत है ।

मृणाल सेन की यह फिल्म बहुत प्रभावशाली है । यह फिल्म इसलिए देखनी चाहिए क्योंकि यह दर्शक को समृद्ध करती है । बड़े बड़े सिद्धांतों से अलग फिल्म उन्हें बड़ी सहजता से दर्शकों को उसके आसपास के उदाहरण से समझाती हुई चलती है । और यह सब बड़ी सरलता से हो जाता है ।

(Girish Sharma आपका शुक्रिया कि आपने यह फिल्म सुझायी । )

आलोक रंजन के फेसबुक वॉल से

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