तुम्हारी नज़र । रमाशंकर सिंह

तुम्हारा गाँव-देहात को याद करने का तरीका है अलग
तुम्हारी नजर भी अलग

चरागाह को जैसे याद करता है जमींदार का बेटा
चरवाहे का बेटा नहीं याद करता है उसे
हरेपन का मतलब अलग है उसके लिए
चरागाह को जिस प्रकार लेखपाल या कानूनगो याद करता है
गड़रिये उसी प्रकार करते नहीं याद

खेत की मेड़ जैसे याद है किसान को
घसियारे को याद नहीं है खेत की मेड़ वैसे ही
यहाँ तक कि गेहूँ का रंग भी अलग है
जो बोता है
जो काटता है
बारह बोझ पर एक बोझ की दर से
उसके लिए गेहूँ का स्वाद भी अलग है
उसकी जीभ तुम्हारी जीभ से अलग है

हर तरह के याद की है अपनी सामाजिकी
ओ मुग्ध आलोचक
तुम शहर में आए बंदर की तरह हो
जो बस की छत पर बैठकर
उसे ही बरगद का पेड़ समझ बैठा

अपने गाँव लौट जाओ
विश्वविद्यालय में तुम बन गए
हद दर्जे के बेवकूफ़

अपनी भाषा में ही तुम्हारी पोल खुल गयी
तुम्हारी नजर
तुम्हारी भाषा की तरह हो गयी है अविश्वसनीय

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