खुद से बात करते उम्र बीत जाती है | जसिंता केरकेट्टा

अंधेरा होने से पहले ही जंगल पार कर लिया था। घर घुसते ही जाकर चूल्हे के पास बैठ गई। मौसी का गांव चारों तरफ़ से पहाड़ों से घिरा है। इन्हीं पहाड़ों-जंगलों के बीच उनकी अपनी दुनिया है। चीज़ों को देखने का अपना नज़रिया है। शहर के नाम पर राउरकेला ( ओड़िशा) गईं है और एक-आध बार रांची। वह चूल्हे में लकड़ियां डाल रही हैं। मेरे घर आने से खुश इतनी हैैं कि एकटक देखती हैं, मुस्कुराती हैं।

कहती हैैं ” ओह रे! मेरा सोना बच्चा। बहुत दिनों बाद आई। तुम्हें देखने को दिल तरसता है। मुर्गी, बत्तख, क्या बनाएं तुम्हारे लिए? बोलो?

“अभी नहीं। हार्वर्ड से लौटने के बाद फिर आएंगे गांव। तब खिला देना”

चौंक कर पूछती हैं

“ये हार्वर्ड क्या है?”

“अमेरिका के बोस्टन शहर में है एक यूनिवर्सिटी। लोग कहते हैं दुनिया की सबसे प्रसिद्ध यूनिवर्सिटी है। वहीं हार्वर्ड इंडिया कॉन्फ्रेंस है। अपनी बात रखने जाना है”

” तुम्हारे साथ कौन जा रहा?”

“अपनी यात्रा अकेले ही करनी होती है सबको ”

इतना सुनते ही वह गहरी चिंता में डूब गईं। कहने लगी

“गांव-घर से लड़कियां मज़बूरी में दिल्ली-मुंबई जाती हैं। तुम्हारी क्या मज़बूरी है? जो तुम्हें हार्वर्ड जाना पड़ रहा है! दिल्ली-मुंबई का नाम तो हमने सुना है। हार्वर्ड का नाम यहां किसने सुना है ? इतनी दूर अकेले कौन जाता है? घर के लड़कों का कुछ नहीं होता। एक तुम्हें ही जाने कहां-कहां जाना पड़ता है। मेरा दिल कितना दुखता है।”

” गोगो! यह जाना, वैसा जाना नहीं है। वहां तक पहुंच कर अपनी बात रखने के लिए एक उम्र लगती है। हम, तुम तो कभी, कहीं नहीं पहुंचते। यह हमारी, तुम्हारी तरह बहुतों की बातों का, भावनाओं का वहां तक पहुंचना है।

तुम और मां गांव से राउरकेला ( ओड़िशा) तक गई। तुम नहीं चाहती तुम्हारी बेटियां उससे भी आगे जाए? एक दिन जब पढ़ने के लिए गांव से भागकर शहर जा रहे थे तब अंधेरे में सड़क तक क्यों छोड़ने आई?

तुम कितनी बातें कहना चाहती थी, अपने गांव में, घर में, पर कभी कह सकी? किसी ने तुम्हें बोलने दिया? किसी ने कभी तुम्हारी सुनी? खुश नहीं होना चाहिए तुम्हें कि तुम्हारी बेटियां कहीं तो अपनी बात रखे?

तुम्हारी तरह कितनी स्त्रियां हैं, मेरी तरह कितनी लड़कियां हैं, कितने लोग हैं, ये जंगल- पहाड़, इन सबकी आज एक सी परिस्थितियां हैं, एक संघर्ष, एक सी कहानियां हैं। क्यों है?

क्या तुम नहीं चाहती कि किसी को तो लिखना चाहिए, बोलना चाहिए, जिन जगहों का नाम तुमने कभी नहीं सुना, वहां तक भी पहुंचना चाहिए। ”

मौसी एकटक मेरा चेहरा ताकने लगी। “हमने इस तरह नहीं सोचा। ऐसा है तो फिर जाओ। इस जिंदगी में हमारी किसने सुनी कभी? खुद से ही बात करते हुए उम्र बीत गई। ” उनकी आंखें भरने लगी।

“ये आंसू किस बात के हैं?”

” ख़ुशी के हैं कि उस रात तुम्हें पढ़ने के लिए घर से जाने दिया।”

और वे चूल्हा सुलगाने लगी….।

(माएं, कभी-कभी बच्चियों जैसी लगती हैं। हाथ थामकर उनसे कह दें कि यहीं हैं। बस इसी एक बात पर उनकी जान बची रहती है।)

© जसिंता केरकेट्टा

जनवरी 2020

“खुद से बात करते उम्र बीत जाती है | जसिंता केरकेट्टा” पर एक विचार

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