चांदनी रातें | विनोद कुमार

भीषण चांदनी रात. तीन ओर खड़े पहाड़. सामने खड़े पहाड़ की ओट से चांद के आकाश में उतरते ही वह गांव एक मायावी दुनियां में बदल गया. मिट्टी के घरौंदों जैसे घर. घर के आंगन जैसी गांव की कच्ची सड़क. शुभ्र सफेद रंग के फूलों वाले कनेल के पेड़. सड़क के अंतिम छोड़ पर खड़ा इमली का घना वृक्ष और उसके नीचे बंधे दो स्तब्ध मवेशी. सब कुछ रजत चांदनी की दुधिया रौशनी से नहा गये.

लेकिन भोगला सोरेन उस दुधिया रौशनी से अभिभूत नहीं हो पाया. उसके मन में तो मानो हाहाकार मची है. चंद रोज पहले कितनी साध से वह सलोनी को ब्याह कर लाया था. उसके रूप और यौवन पर मुग्ध भोगला जब भी उसे अंग लगाना चाहता तो वह सिसक पड़ती. न जाने क्यों वह उससे विमुख और उदास थी. क्या पता यह भोगला का भ्रम हो, क्योंकि दिन भर वह घर के काम काज में व्यस्त और सामान्य ही दिखती, लेकिन चांद के निकलते ही पता नहीं क्या हो जाता और वह बदल जाती. यह कुंवारे मन- तन की अवगुंठा थी या कुछ और? वह यह समझ नहीं पा रहा था. आज तीसरे दिन भी वैसा ही कुछ हुआ और भोगला निराशा की गर्त में डूब गया.

भोगला ने पल भर उससे मुंह फेर कर पड़ी सलोनी की काया को मोहभर देखा और उठ कर बाहर दालान में चला आया. बादल के रूई के फाये जैसे छितराये टुकड़ों के बीच आकाश में चांद भागता नजर आ रहा था. और उसका मन चित्कार कर उठा.
‘‘… बीड़ू तो आलोड़अकिअ
करेगा ते अलोड़किअ
संगोबाईआ ओन्डोरोब नो उम्बुओ ?…’’

मेरे मीत, मैं पहाड़ से गाता हूं, करगा से गाता हूं. तुम सुनती हो या नहीं..?

दरअसल भोगला पूछता नहीं, जानना चाहता है कि सलोनी उसकी उत्कंठा, उसकी आत्मा की असीम प्यास को सुनती क्यों नहीं? क्या उसे ब्याह कर उसने कोई अपराध कर डाला? क्या वह किसी और को चाहती है?
सलोनी सोई नहीं हैं. वह किशोरावस्था को पार कर यौवन की दहलीज पर खड़ी है. भोगला के हृदय के अद्भुत-असीम प्यास से वह अछूती कैसे रह सकती है? वह पूरे मन से उसकी ब्याहता बन कर उसके घर आई है. वह इतनी चैतन्य भी है कि भोगला के प्रति अपने व्यवहार को सही नहीं ठहरा पाती. वह उससे कुछ कहना भी चाहती है. लेकिन वह क्या करे? उसका कंठ अवरुद्ध हो जाता है कुछ कहते, हालांकि वह भोगला के प्रश्न का जवाब देना चाहती है. वह कहना चाहती है..
‘‘बीरु ते अलोड़किम, करेगा ते अलोड़किम
संगोनाइ, ओन्डेरना जो ओन्डोराइ
अंचेरा ते लुउना जुनि पालोओ..’’

ऐ मीत, तुम जो पहाड़ से गाते हो, करगा से गाते हो..सुनने को तो मैं सुनती हूं, लेकिन उसे अंचरा में झोंक नहीं पाती..अंगीकार नहीं कर पाती..

मगर क्यों? यही तो जानना चाहता है भोगला. वह गांव में रहता है, लेकिन शहर के कालेज में पढ़ता है. शिक्षित युवक है. उसके मन में अपनी प्रेयसी पत्नी के लिए तरह तरह की कल्पनाएं तैरती रहती है. उसने खुद सलोनी को पसंद किया था. क्या वह किसी और को प्यार करती है? वह उसकी इच्छा के बगैर उसे ब्याह लाया है?

सलोनी पितृहीना है. और धीर गंभीर युवा लड़की सरीखी दीखती है. लेकिन एक दुर्घटना में पिता की मौत के पहले वह एक खिलंदर व भोली लड़की थी. सबेरे उठती और अपने नन्हे नन्हें हाथों से घर के काम काज में लग जाती. जब आकाश में अंधेरा ही छाया रहता तो उसकी दिनचर्या शुरु हो जाती. ढेकी में मां के साथ धन कूटने में लगती. गोबर और लकड़ियां चुन कर लाती. घर के झाड़ पोछ और रंग रोगन में मां की मदद करती. कांसे के दो चार बर्तन जो उसके घर में थे, उसे रगड़-रगड़ कर चमका देती. फिर रात का बचा पानी भात खाकर ढोर बकरी चराने निकल जाती. धीरे-धीरे वह बड़ी होने लगी थी, लेकिन लेकिन बाल सुलभ उसकी निश्छलता खत्म नहीं हुई थी. हाल तक उससे कोई पूछता कि सलोनी, सूरज कहां से निकलता है? तो वह पंजो के बल थोड़ा उचक कर वह जबाबा देती – ‘ वह उस पहाड़ी के पीेछे से..’ सूरज के बारे में उसकी धरणा थी कि वह सामने की पहाड़ी से निकलता है और शाम ढले पीछे की पहाड़ी के पीछे छुप जाता है. रात भर वह किसी गुफा में सोता रहता है और फिर दूसरे दिन सामने की पहाड़ी से निकल आता है.

दिन भर घर के काम काज में व्यस्त रहने के बावजूद वह थकती नहीं. हर वक्त तरोताजा, किसी जंगली फूल की तरह. चांदनी रातों में जब कभी गांव के अखड़ा में गोला सजता और मांदल की थाप गूंजती, वह अपनी मां का हाथ पकड़ खींचती हुई वहां पहुंच जाती. कुछ देर में ही उसकी कूक सामूहिक समवेद स्वर में घुल मिल जाता. स्त्री स्वर लहराता- ‘..तुमने मेरी चूड़ी क्यों फोड़ी, तुमसे मैं बालूंगी नहीं..’ और जबाब में पुरुष स्वर लहराता- ‘..अगले बुध ले आउंगा कलिकापुर हाट से ढेर सारी चूड़ियां..’

सलोनी का गांव भोगला के गांव के करीब 20 किमी दूर पहाड़ की तराई में बसा है. पहाड़ पर खड़िया समुदाय के आदिवासी रहते हैं और नीचे के गांव में संथाल. उसके पिता जंगल विभाग के ठेका मजदूर थे. एक दिन काम के दौरान बगल का एक विशाल दरख्त भहरा कर उनके उपर गिरा और उनकी मृत्यु हो गई. कई रोज तक यह पता भी नहीं चला कि उसका बाप कहा गया? उसे जमीन खा गई या आकाश निगल गया. बाद में पता चला कि जंगल का ठेकेदार झमेले से बचने के लिए उसके साथ काम कर रहे मजदूरों को खिला पिला कर वही कहीं मिट्टी में उसके शव को दबा दिया. बात खुल गई तो सलोनी और उसकी मां के रोने गिड़गिड़ाने पर गांव के कुछ लोग उसके साथ थाना पर शिकायत दर्ज कराने निकले तो, लेकिन रास्ते में एक एक कर खिसक गये. थानेदार के पास जाने का किसी में साहस नहीं था.

सलोनी की मां भी लौट आई. उसने सब्र का पहाड़ अपनी छाती पर रख लिया. और सलोनी को छाती से लगा कर जिंदगी के जद्दोजहद में लग गई. जीवन पुराने ढर्रे पर चलने लगा था. गांव में लोगों की मदद के बावजूद खेती का काम अब पहले जैसा नहीं रह गया था. बहुधा उन दोनों को मजूरी करने के लिए आस पास के गांव कस्बे में निकलना पड़ता. दुख और जीवन के संघर्ष ने मां बेटी के बीच एक बहिनापे को जन्म दे दिया था. सलोनी दिन रात अपनी मां के साथ छाया की तरह लगी रहती. और शाम घिरते ही ढिबरी बुझा कर सबेरे सकाल उससे लिपट कर सो जाती. हां, उनके उदास जीवन में चांदनी रातों का विशेष महत्व होता था. चांद की उज्जवल रौशनी में वे घर का छोटा मोटा काम काज भी कर लेते और घर की दहलीज व दीवारों पर फूल पत्ती बनाते. यदि अखड़ा से मांदल बजने की आवाज आती तो सलोनी का पैर थिरक उठते और वह अपनी मां को भी जबरन उधर खींच ले जाती. हड़िया की दो घूंट से तन बदन से थकान गायब हो जाती और वे देर तक समूह के साथ नाचते गाते रहते.

और इसी तरह जीवन चला जा रहा था, कि एक शाम सलोनी के जीवन में भोगला अप्रत्याशित ढंग से शामिल हो गया. उस शाम सलोनी कुछ सहेलियों के साथ करीब के जंगल से लकड़ी लाने निकली थी. लौटते समय उसके सर पर लकड़ी का एक बड़ा बोझा लदा था. पसीने से वह नहा गई थी. ढलते सूरज की आंच में उसका पूरा बदन तांबे से झिलमिला रहा था. कपोल और नाभि के इर्द गिर्द पसीने की बूंदे हीरे जैसे झिलमिला रहे थे. एक जगह रुक सर के बोझ को एक दरख्त के तने से टिका कर वह आंचल से अपने गले का पसीना पोछने लगी. अचानक नजर उठाया तो देखा, एक युवक विमुग्ध् भाव से उसकी तरपफ देख रहा है. सलोनी निःसंकोच हंस दी और लकड़ी का बोझ सर पर रख अपने गांव की तरफ बढ़ चली. वह युवक भी उसके पीछे-पीछे गांव के मुहाने तक आया और फिर लौट गया.

वह भोगला सोरेन था. समीप के गांव का ही रहने वाला. उसके घर में अच्छी खेती बाड़ी होती है. वह गांव का एकमात्रा लड़का था जो शहर के कालेज में पढ़ता था. वह किसी काम से पास के ही किसी अन्य गांव में आया था और लौटते वक्त उसकी मुलाकात सलोनी से हो गई थी. अपने गांव घर लौट कर वह दो तीन दिनों तक विचार करता रहा और फिर उसने अपनी मां से सलोनी से विवाह की इच्छा प्रगट कर दी. पूर्व मे जब उसकी मां उसके सामने विवाह की बात करती तो वह इंकार कर देता था, यह कहते हुए कि उसे अभी और पढ़ना है. इसलिए उसके मुंह से विवाह की इच्छा की बात सुन कर वह अचंभित हुई, फिर सहर्ष तैयार हो गई. खुद सलोनी के गांव गई और उसकी मां से विवाह की बात की. उसे भला क्यों इंकार होता. भोगला पढ़ा लिखा सुदर्शन युवक था. फिर भी उसने एक बार सलोनी की तरफ देखा.
‘उसे क्या देखती है. वह भोगला से मिल चुकी है. उसे पसंद करती है.’
सलोनी क्या कहे? फिर भोगला को नापसंद करने की कोई वजह नहीं थी. जबाब देने की जगह उसका चेहरा आरक्त हो उठा. सलोनी की मां उसके मन के भाव को समझ गई और फिर सलोनी का ब्याह भोगला से हो गया.
नई दुनियां और भोगला के गांव का वातावरण उसके अपने गांव से बहुत भिन्न था. सभी नई बहू के स्वागत में लगे थे. उसे अच्छा खाने को मिला. पहनने को मिला. चांदी की हंसुली और कड़े भी. और वह सब पहन उसका रूप पहले से ज्यादा खिल गया.

लेकिन सलोनी को यह सब अच्छा नहीं लग रहा था. उसे बार- बार अपना गांव, अपनी छोटा सा घर और दरिद्र मां याद आती. उसके बगैर कितनी अकेली हो गई होगी वह. उसके सिवा उसका और कौन है पूरे जहान में. फिर भी वह पूरे दिन तो सबों के बीच सामान्य बनी रहती और अपनी सास के साथ घर के काम काज में हाथ बंटाती लेकिन भोगला के साथ एकांत में होते ही उदासी बुरी तरह उस पर सवार हो जाती.

उन दिनों भरपूर चांदनी थी. भोगला उसकी तरफ चाहत भरी आंखों से देखता. लेकिन जिस चांद को देख भोगला का मन बौराने लगता, उसी चांद को देख सलोनी की आंखें डबडबा जाती.
….अब नहीं सहेगा भोगला. वह जान कर रहेगा, सलोनी उससे इस कदर विमुख क्यों हैं. दहलीज से निर्निमेष आकाश में भागते चांद को कुछ देर देखते रहने के बाद वह वापस आया और सलोनी को एक तरह से झकझोड़ कर उठाया.
..इस तरह क्यों मुंह फेरे हो मुझसे..मुझको नहीं चाहती..किसी और को चाहती है..फिर मुझसे विवाह के लिए क्यों तैयार हो गई..

सलोनी गहरी नींद से भले नहीं, लेकिन झकझोर कर उठाई गई थी. कुछ देर तो उसे संभलने में लगा, फिर सोरेन की बात सुन कर उसका कलेजा दर्द से भर उठा. भोगला की उत्कंठा और परेशानी उससे छुपी नहीं थी, लेकिन इन बातों का वह क्या जबाब दे. वह जबाब देना भी चाहती है तो उसके गले से आवाज नहीं निकलती, गला अवरुद्ध हो जाता है.
‘..बोलती क्यों नहीं..किसी और को चाहती हो?’
भोगला चटाई से उठ आंगन में उतर चांद की तरफ मुंह करके खड़ा हो गया.

सलोनी बहुत परिश्रम से उठी, उसके पीठ पीछे जा कर खड़ी हो गई और उसके कंधे को हौले से छू कर भरे कंठ से बोली – ‘.. नहीं, वह किसी और को नहीं चाहती, उसे ही चाहती है..उ..उसे ही प्यार करती है. लेकिन उसे अपनी मां बहुत याद आती है..बहुत गरीब हैं वे लोग..पता नहीं अब उसकी मां गांव में अकेली कैसे रहती होगी? कैसे घर के काम काज निबटाती होगी..चांदनी रातों में वे संग संग अखड़ा जाय करते थे..लेकिन चांद तो उसके साथ अब इस देस चला आया है..’

सलोनी के आत्मीय स्पर्श से अभिभूत भोगला की इच्छा हुई कि वह ठठा कर हंसे, लेकिन हंसने के बजाय उसके स्वर और भंगिमा से वह भींग गया. पीछे मुड़ कर उसने अपनी प्रेयसी पत्नी को हृदय से लगा लिया. पहले उसकी इच्छा हुई कि वह उसे समझाये और बताये कि चांद किसी के साथ कही नहीं जाता, सबके आकाश में बना रहता है..लेकिन फिर भरे गले से इतना ही कह सका – ‘..हम दोनों कलेे चलेंगे तुम्हारे गांव, मां के पास..’

सलोनी का पूरा बदन हौले से थर्राया और फिर थिर गया.

चित्र : बी प्रभा की, साभार..

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