लोक गायक | जीवन के दिन |प्रभात

सतही तौर पर उसे किसानों और श्रमिकों का कवि कह सकते हैं
उनके जीवन से जो शब्द बनते हैं
प्राय: उन्हीं को काम में लेता है वह कविता रचने के लिए
धूल की तरह साधारण शब्द
ओस की तरह चमकने लगते हैं उसकी कविता में आने पर
बीजों की तरह अँकुआने लगते हैं गाए जाने पर

उसका विशाल वाद्य घेरा
मृत जानवर की खाल से बनता है
जब वह गूंजता है
पास ही जंगलों में खड़े भैंसे
त्वचा पर स्पर्श का अनुभव करते हैं

खेतों की मेड़ पर खड़े धवल फूलों वाले कांस
कांसों की जड़ों से सटकर बैठे बैल
इधर-उधर खड़े तमाम छोटे-बड़े पेड़ और झाड़
छोटे और बड़े कद के पहाड़
कान देते हैं उसकी आवाज पर

वह आवाज जिसमें आँधियाँ हैं
आँधियों की नहीं है
वह आवाज जिसमें बारिशें हैं
बारिशों की नहीं है

पवन झकोरों और बारिश की बौछारों सी
काल से टकराती आती यह आदिम आवाज
पृथ्वी पर आदमी की है

अर्द्धरात्रि में जब वह उठाता है कोई गीत
रात के मायने बदल देता है
अगम अँधेरों में गरजते समुद्रों के मायने बदल देता है
अनादि सृष्टि में चमकते नक्षत्रों के मायने बदल देता है
वह हमें बाहर के भेद देता है
वह हमारे भीतर के भेद देता है
चाहे तो शब्द से
चाहे तो दृष्टि से
चाहे तो हाथ के इंगित से पुकार लेता है
सभा में सत्य को उतार देता है

चाँदनी में बैठे ग्रामीण अलाव तापते हुए सुनते हैं उसे
अलावों के चहुँओर दिपदिप चेहरों पर
रह-रह खेलती है आदिम मुस्कान

25.1.15

15-16 • जीवन के दिन |प्रभात