मैणान की होड़ी | मोहन लोदवाळ

मीणाओं के लोकगीत की यह विधा लगभग लुप्त हो गई है।
अब इसके गीतकार, मिज़ाज, गांव की रौनक सब खत्म हो गई है। होड़ी की पूर्व संध्या वाली रात और होड़ी के दिन की पूरी रात इसे सामूहिक रूप से गाया जाता था। यह वैसे ही खत्म हो गए हैं जैसे सावन के गीत खत्म हो गए हैं।

फर्क इतना सा है कि सावन के गीत गांव की बहन, बेटियों द्वारा किसी बड़े पेड़ की डालियों पर डाले गए झूलों पर सामूहिक रूप से गाए जाते हैं जबकि होड़ी के गीत भी महिलाओं द्वारा ही जाते हैं लेकिन इसमें गांव की बहन, बेटियों के साथ-साथ गांव की बहू और औरतें भी गाती हैं। कहीं-कहीं पुरूष लोग भी अलग समूह में गाते हैं।

1-एक जलेबी दो लाडू, होड़ी का डांडा खां गाडू।
2-होड़ी मंगड़े जब बूंद पड़े, संवत को धोखो नहीं मइया।
3-आम तड़े मत पीटे मेरे बलमा, या हरियो चुगली कर जायगो।
5-पीलू काटयो जड़ में से, क्या खाएगी छोरी लफर में से।
6-नौ मण जीरो नौसे को, मेरा जेठ बिना कूण बेचेगो।
7-ओखड़ी में रांदयो मिठो लपटो, खा गयो जेठ बड़ो नकटो।
8-कोड़ड़ा को पेड़ म्हारा बाड़ा में, दे दियो बाईजी का गौणा में।
9-पालक्या के बंध रही घंटाड़ी, चमके रे रात्यों सो बाड़ी।
10-पलक्या पे पग जब दीज्यो, पहले खेत की सला मिला लीज्यो।
11-बड़ रे गैबी पटवारी, म्हारी पौड़ी के लगागो पितकाली।
12-पीलू को मचोल्या मेरी जीजी के सू लाई, घुड़-घुड़ रे बालम ने तोराड़यो।
13-आज बलम ने कांई सोची, चटनी से खा गो नौ रोटी।
14-नौ बीघा आरेड़, बकरिया खा गई बूचा कानन की।
15-चना में आ गई घेघरिया, रमझोल गड़ा दे देवरिया।
16-चना कटे म्हारी पाटी में, मरमोल्यो झांके घाटी में।
17-एक टेंट में तीन चना, संवत को धोखो नहीं मइया।
18-हरिया चाल्यो जौ चुगवा, म्हारे देवर कू लेगो रुखाड़ी किरवा।
19-आंकड़ा की लकड़ी, धौंकड़ा को बीज, जा रे गैबी नितला, रोटी करवा सीख।
20-होड़ी पे चढ़गो सांप-सडूको, भारी हो गई देवरिया।
21-कुंआ पे से हैलो पाड़े काकी ससुरो, तोड़ लाई गजरो।
22-भटा उजड़ेगे बाड़ी के, मन भटके जीजा-साड़ी के।

अंत में, धुलैंडी वास्तव में धूल, गारा आदि से ही खेली जाती थी, रंग तो बहुत बाद में आए हैं। तथापि, हमारे यहाँ जो महत्व और आनंद होड़ी का था वह धुलैंडी में नहीं था। अब वह प्यार, भाईचारा, उमंग, चाव, अपनापन, सामूहिकता जैसे-जैसे खत्म होती जा रही है वैसे-वैसे सारे तीज-त्योहार नीरस, रस्मी और औपचारिकता पूर्ण होते जा रहे हैं।

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