इन्गल पिंगल | शिव योगी

इन्गल पिंगल कर रही अपने स्वर की साध।
रे मन होजा साथ में कटे सकल अपराध ।।

इन्गल पिंगला नार है कह गये चतुर सुजान ।
कौन गति है सबद की इक चंदा इक भान ।।

गंगा जमुना बह रही नौसे नदियों बीच ।
जब सूखी हो जायेगी मिट जायेगा कीच।।

सुखमण के नियरे बने गंगजमन के घाट ।
क्या उठना क्या बैठना मन में बसी उछाट।।

धरा अधर के बीच में नित बहती है धार ।
बहता पानी रूक गया मिला मुक्ति का द्वार ।।

शिव योगी

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