कुरार गाँव की औरतें | देवमणि पांडेय

(1)
कुरार गाँव की औरतें ऑफिस नहीं जातीं
वे ऑफिस गए पतियों और
स्कूल गए बच्चों का करती हैं इंतज़ार
बतियाती हैं अड़ोस पड़ोस की औरतों से
या खोल देती हैं कोई क़िस्सा कहानी

उनके क़िस्सों में ज़्यादातर होती हैं औरतें
कि किस औरत का भारी है पैर
कौन पिटती है पति से
या कौन लड़ती है किससे
वे इस बात में रखती हैं काफ़ी दिलचस्पी
कि कल किसकी बेटी
बाहर से कितनी लेट आई
और किस लड़की ने
अपने माँ बाप की डाँट खाई

खाना – पानी, कपड़े – बच्चे
सिलाई – कढ़ाई – लड़ाई
और न जाने कितने कामों के बावजूद
किसी ख़ालीपन का एहसास
भर जाता है उनमें
बेचैनी, ऊब और झल्लाहट
और वे बुदबुदाती हैं
समय की सुस्त रफ़्तार के खिलाफ़

(2)
कुरार गाँव की औरतें
टीवी पर राम और सीता को देखकर
झुकाती हैं शीश
कृष्ण की लीलाएं देखकर
हो जाती हैं धन्य
और परदे पर झगड़ने वाली औरत को
बड़ी आसानी से समझ लेती हैं बुरी औरत

वे पुस्तकें नहीं पढ़तीं
वे अख़बार नहीं पढ़तीं
लेकिन चाहती हैं जानना
कि उनमें छपा क्या है !
घर से भागी हुई लड़की के लिए
ग़ायब हुए बच्चे के लिए
या स्टोव से जली हुई गृहणी के लिए
वे बराबर जताती हैं अफ़सोस

उनकी गली ही उनकी दुनिया है
जहाँ हँसते-बोलते, लड़ते-झगड़ते
साल दर साल गुज़रते चले जाते हैं
और वक़्त बड़ी जल्दी
घोल देता है उनके बालों में चाँदी

(3)
कुरार गाँव की औरतें
अच्छी तरह जानती हैं कि
किस वर्ष बरसात से
उनकी गली में बाढ़ आई
किसके बेटे-बेटियों ने शादी रचाई
किस औरत को
कब कौन सा बच्चा हुआ
और कब कौन उनकी गली छोड़कर
कहीं और चला गया

लेकिन उन्हें नहीं पता कि तब से
यह शहर कितना बदल गया
कब कौन सा फैशन आया और चला गया
और अब तक समय
उनकी कितनी उम्र निगल गया

अपनी छोटी दुनिया में
छोटी झोंपड़ी और छोटी गली में
कितनी ख़ुश –
कितनी संतुष्ट हैं औरतें
सचमुच महानगर के लिए
चुनौती हैं ये औरतें

(4)
कुरार गाँव की औरतें
तेज़ धूप में अक्सर
पसीने से लथपथ
खड़ी रहती हैं राशन की लाइनों में
देर रात गए उनींदी आँखों से
करती हैं पतियों का इंतज़ार
मनाती हैं मनौतियां
रखती हैं व्रत उपवास
और कितनी ख़ुश हो जाती हैं
एक सस्ती सी साड़ी पाकर
भूल जाती हैं सारी शिकायतें

वे इस क़दर आदतों में हो गईं हैं शुमार
कि लोग भूल गए हैं
वे कुछ कहना चाहती हैं
बांटना चाहती हैं अपना सुख-दुख

देर रात को अक्सर
दरवाज़े पर देते हुए दस्तक
सहम उठते हैं हाथ
किसी दिन अगर
औरतों ने तोड़ दी अपनी चुप्पी
तो कितना मुश्किल हो जाएगा
इस महानगर में जीना

देवमणि पांडेय : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, निकट महाराजा टावर, फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063
98210 82126

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