भीलणी | हरिराम मीणा

इस बहुरंगी दुनिया में
मेवाड़ी धरती
उस धरती मे विरल भीलणी
निर्मल, शुभ्र हृदय उसका
पर

तम-आच्छादित उसकी काया
किन अतीत के अभिशापों की काली छाया
पड़ी निरन्तर उसके तन पर

ले दोपहरी से अंगारे
धूणी रमती
वन वन फिरती
वह तपस्विनी
श्रम की देवी
फटा घाघरा तन से लिपटा
तार-तार चोली लज्जा की रक्षा करती
अन्तिम साँसें रोक ओढ़नी सर को ढकती.

अरावली पर्वतमाला की काली घाटी
काली घाटी के तल में कँकरीली माटी
फटे खोंसड़े ही उसके पैरों की जूती
बीच-बीच में पगतलियां धरती को छूती.

राह रोकते शूल झाड़ के
नागफनी के पुंज रोकते उसके पथ को
जीवन-रथ को.

दयावान कुछ पेड़ द्रवित हो
उस वनदेवी को ज्यों देते सूखी लकड़ी
बीन-बीन कर उनको चुनती
तोड़-तोड़ कर गठरी बुनती
उस गठरी को माथे धरती
खट-खट फट-फट
चलती ढोती

उसके तन के रोम-रोम के छिद्र-छिद्र से
फूट-फूट कर निसृत होता स्वेद-निर्झरा
टप-टप टपका
उस तपस्विनी का मन
कुछ क्षण चलते-चलते घर जा अटका.

घर क्या होगा उस दरिद्र का
एक डूंगरी की छाती का लेकर सम्बल
टूटी-फूटी रूग्ण झोंपड़ी
पर्ण-कुटी सी
कोलू मिश्रित
बीच-बीच में गगन झाँकती
मानवता का मूल्य आँकती.

उस अभाव के ही आश्रय में
नन्हें-नन्हें उसके बालक
भील गया दूरस्थ देश मजदूरी करने
घर की कुछ उम्मीदों को ज्यों पूरी करने.

’’मैं रोटी लेने जाती हूँ अभी-अभी वापस आती हूँ।’’ यह कह कर चुपचाप
क्षुधा की तृप्ति हेतु
वह अस्थि-पुंज सूखी लतिका-सी
रोटी की ठण्डक तलाशने
निकली वन, पर्वत, उपत्यका
उलट चली सूखी सरिता-सी.

भोर सुनहरी उसको जैसे
पीली-पीली
मक्का की सी रोटी दिखती
चढ़ते सूरज संग भागती
वन-प्रान्तर में

छिपती फिरती
कहीं छिप गई
इस रोटी की ही तलाश में
जंगल की सूखी लकड़ी में
दिन-भर फिरती

वह अभागिनी
श्रम की जननी
वह तपस्विनी.

साँझ ढले
बाजार फिरे
ले लकड़ी गठरी
गंध खोजती रोटी की सी
मिली अन्त में उसे कमाई
पर थोड़ी-सी.

वह थोड़ा-सा श्रम का प्रतिफल
घर का सम्बल
कैसे करता तृप्त
निर्धना का मरू-जीवन.

दिन-भर का श्रम भूल
दिन छिपे
वह श्रम देवी
पूरी राहें
धेनु समान ममत्व छिपाती
मन ही मन में

वह रम्भाती
फिर घर आती.

भूख सताए नन्हें बालक हो हताश
सो जाते तब तक
ठाठ पड़े श्यामल-श्यामल, निर्बल

पर, जीवटमय
दोनों हाथों से उन्हें जगाती
वक्ष लगाती
रोती-रोती
देती रोटी
वात्सल्य का भार लिए उर

रूद्ध कण्ठ भींचे अभाव सुर
उन्हें खिलाती
उन्हें सुलाती.

अब थे बालक अंक नींद की
बीच-बीच में स्वप्न
चाँद से परी उतरती
हाथ सजा कर थाल
स्वप्न में व्यंजन देती
पर स्वप्नों के इस यथार्थ को
खूब जानती भील तापसी

वह थी भूखी
रोटी उस को कहाँ बची थी
श्रम की बेटी
थक कर लेटी
उधर झोंपड़ी के आँगन में
बिखर रही मधुसिक्त चाँदनी
फूले महूआ के पातों से
छान-छान दे रही यामिनी.

क्षुधा-व्यथित वह भील-सुता
निज यौवन में भी प्रौढ़ा-सी
निज प्रौढ़ आयु में वृद्धा-सी.

बाहर बिखरी चन्द्रिका
गगन में चन्द्र देख
(नागार्जुन बाबा तो शायद / रोटी का रूपक भूल गया / कुछ और चाँद में ढूँढ रहा)

पर
देख भीलणी ने चंदा
आकार गोल
धवला-धवला
रोटी की ठण्डक-सा ठण्डा. कल्पनामग्न
ज्यों चाँद ज्वार की रोटी हो
परतें कुछ मोटी-मोटी हो
उतरा धीरे-धीरे हिय तल
कुछ शांत हुई ज्यों जठर-अनल
यह कैसी
क्षुधा-शान्ति उसकी
कैसी थी प्रबल भ्रान्ति उसकी?

था खाली पेट
अँधेर घुप्प के अन्धकूप में
स्वप्न जल रहे थे उसके अतिक्रुद्ध धूप में.

अब, अन्तरंग पीड़ा तरंग
वन में बिखरी
पर नहीं वेदना तनिक
सकल वन था निःस्वन
बस एकमात्र पलाश ही को तो थी अखरी.

क्रुद्ध था पलाश
आग उगलता
शाख-शाख
फूट-फूट
रक्तवर्णी एक-एक फूल उसका धधकता
देख, महुआ भी तड़पता
रूदित होता रात भर
झर-झर टपकता.

हार थक
चुपचाप
फिर वह जिन्दगी का भार ढोती
ना दिखे औरों को चाहे
पर तपः तनया के भीतर
प्रखर अग्नि धधकती
खदकते इस्पात की सी
धार पकती.

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