उत्सवनुमा कोलाहल | हेमन्त झा

यह भी राजनीति का एक पक्ष है। आप अपनी सुविधा के हिंसाब से इसे कुरूप या सुरूप कह सकते हैं।
आपदा में भी अपना पोस्टर आगे कर लेना…और…चारणों की जमात का लग जाना उस पोस्टर पुरुष की जय जय कार में, तालियां बजाते सेलिब्रिटीज, सिर हिनहिनाते भेड़ों के झुंड के झुंड…शहर दर शहर…उन्हें थालियां पीटते, घण्टे बजाते, पटाखे फोड़ते हुए लाइव दिखाते न्यूज चैनल…।

ऐसे उत्सवनुमा कोलाहल में ये सवाल पीछे छूट जाते हैं कि कोरोना संक्रमण से निबटने की सरकारी तैयारियां कैसी हैं…कि इस संकट से उपजी अन्य आपदाओं से निबटने के लिये सरकारें क्या कर रही हैं।

“…मोदी जी के आह्वान पर 130 करोड़ भारतीय एकजुट…” का कैप्शन लगातार दिखाते न्यूज चैनलों पर मंत्री जी, नेता जी, सेलिब्रिटीज जी आदि लोगों को थालियां-तालियां पीटते ऐसे दिखाया जा रहा था जैसे दीवाली में फुलझड़ी जलाते बड़े लोगों को दिखाया जाता है। फिर उनका वक्तव्य, जैसा कि प्रकाश जावड़ेकर को हमने कहते सुना, “देश के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ था कि किसी नेता के आह्वान पर 130 करोड़ लोग एक साथ थालियां बजा रहे हों”…या कि अनुपम खेर का यह कहना…”अपने जीवन में मैंने ऐसा कभी नहीं देखा…।”

अपनी ब्रांडिंग करने और करते रहने का बेहतरीन हुनर जिसमें हो, राजनीति में वह उतना आगे जा सकता है। यह ‘पोस्ट-ट्रूथ पॉलिटिक्स’ के आज के दौर का स्वभाव है, उसकी प्रकृति है।

सत्य को नेपथ्य में धकेल कृत्रिम माहौल की निर्मिति, जिसमें जनमानस अजीब से धुंध का शिकार हो जाए। सत्ता की विफलताएं ढकी रहें और राजनीति चलती रहे…भेड़ों के झुंड मुंडियां हिनहिनाते रहें, विचारशील लोगों की चिंताएं अप्रासंगिकताओं के हाशियों में गुम होती जाएं।

जिस वक्त न्यूज चैनल बॉलकनी और चौराहों पर थालियां पीटते लोगों को दिखा कर हमें देशभक्ति और राष्ट्रीय एकता से ओतप्रोत कर देने की भाषा में संबोधित कर रहे थे, हर तीसरे चौथे वाक्य में ‘मोदी जी के आह्वान’ की महिमा को बखान रहे थे, ठीक उसी वक्त पटना के विभिन्न रेलवे स्टेशनों पर, बस स्टैंड पर सुदूर राज्यों से भाग कर आए बिहारी श्रमिक, आम लोग हलकान हो इधर-उधर भटक रहे थे। अचानक से तमाम ट्रेनों को रद्द करने की घोषणा, बसों का बंद हो जाना, दुकानों, रेस्टोरेंट्स की बंदी… हजारों लोग सांसत में।

आखिर… रोजगार खो कर मुंह लटकाए अपने गांव को वापस लौटते लोगों की भीड़ भी इसी ‘130 करोड़ भारतवासियों’ का हिस्सा है जिनके लिये न सरकार के पास कोई स्पष्ट और कल्याणकारी दृष्टि है, न मीडिया को उनके लिये वक्त है।

कोई नहीं जानता कि बाहर से आने वाली उस भीड़ में कितने लोग संक्रमित हैं। यहां तो तीन अस्पतालों से गुजरने के बाद पटना एम्स में रोगी मर गया उसके बाद पता चला कि…”अरे, यह तो कोरोना संक्रमित था”।

जब हम अपने राज्य और देश की आधारभूत संरचना के बारे में वास्तविक तथ्यों का पता करने का प्रयास करते हैं तो सांसें थमी की थमी रह जाती हैं…”हे भगवान, अगर संक्रमण का दायरा थोड़ा भी बढ़ा तो हालात काबू से बाहर हो जा सकते हैं।” विशाल आबादी को देखते हुए स्वास्थ्य तंत्र की आधारभूत संरचना के मामले में हमारा देश तो दरिद्र है ही, हमारा राज्य तो परम दरिद्र है।

तो…सच्चाइयों का सामना करने-करवाने से बेहतर है कि आपदा में भी उत्सव के सूत्र तलाशे जाएं।

तो, हमने सुसज्जित फ्लैट्स की बॉलकनी में जा कर, सड़कों और चौराहों पर भीड़ लगा कर उत्साह और जिजीविषा के साथ थालियां पीटी, तालियां बजाईं, पटाखे फोड़े। झुग्गियों और फुटपाथ के बच्चों का भी उत्साह देखने लायक था…छोटे छोटे हाथों में थामी थालियों की टन टन टन टन की आवाजों के साथ उनकी उन्मुक्त खिलखिलाहटें…।

हम उम्मीद करें कि ये मासूम और निर्दोष खिलखिलाहटें कायम रहें और आपदा जल्दी से गुजर जाए।

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