जन्मदिन| स्मरण【3 अप्रैल 1929–25 अक्टूबर 2005】

निर्मल बहता हुआ पानी- माधव राठौड़


निर्मल के प्यार में कब पड़ा ,मुझे ठीक से याद नहीं आ रहा है। पर वो रात याद है। मैं उन दिनों जयपुर में इमली फ़ाटक पर रहा करता था।सर्दियों के ढ़लने के दिन थे। पर दो रोज पहले ही जयपुर में ओले गिरे थे।तापमान फिर से नीचे गिर चुका था।मैं रजाई में दुबका “अंतिम अरण्य”पढ़ रहा था। आधे से ज्यादा पढ़ा तब तक मैं अजीब से एकांत के डर से घिर गया था।
फिर कई दिनों तक यह उपन्यास और लेखक मेरा पीछा करते रहे।
मैंने कहानियाँ पढ़ी,उपन्यास पढ़े,रेखाचित्र पढ़े,डायरी पढ़ी।निर्मल के ख़त पढ़े। निर्मल को प्यार करने वाले लोगों ने जो लिखा उसे पढ़ा।
इस बीच हिंदी के उभरते युवा लेखक ने मुझे सलाह दी -निर्मल वर्मा से बाहर आओ।
यह सलाह ठीक वैसी थी जैसी मेरे दोस्त ने दी थी कि यह प्यार-व्यार छोड़ो ,अपना मन पढ़ाई में लगाओ,इस छोरी के चक्कर में तुम बर्बाद हो जाओगे।
यह दोनों सायास नहीं हुए थे। न ही मैंने निर्मल वर्मा से चलाकर प्यार किया, न हीं उस इंग्लिश मीडियम वाली लड़की से।
ऐसा नहीं कि इस बीच मैंने अन्य लेखकों को नहीं पढ़ा । और यह बात भी इतनी सच है कि इस बीच कई लड़कियाँ आई। पर निर्मल वर्मा वो बहता हुआ पानी था जहाँ शीतलता थी।
उनकी भाषा का टटकापन पाठक को बांध देता है। टटकी भाषा से वे जो बिंब बनाते हैं वो पाठक के ज़ेहन में कई दिन तक उभरते रहते हैं।
निर्मल को पढ़ते हुए आप आवेग में नहीं आते,आपको आक्रोशित नहीं करते।वे धीरे धीरे आपको एकांत की तरफ ले जाते हैं, जहाँ और कोई नहीं होता।पाठक और लेखक का एकांत।
उसी एकांत की घड़ी में वे पाठक को चुपके से अपनी बात कह देते हैं जो आक्रोशित लेखक कभी कह नहीं पाते।
वे विश्व युद्ध मे नष्ट हुए लिदित्से को देखते हुए संस्मरण लिखते हैं कि “सोचता हूं, क्या अर्थ है हमारे लिए लिदित्से का ? हम ,जो दुनिया के दूर सुदूर देशों से यहां आए हैं हम सब ने अलग-अलग शहरों में अरसा पहले लिदित्से का नाम सुना था ,अपने अपने ढंग से उसके संबंध में सोचा था। किंतु इस क्षण लगता है एक उड़ती हुई धुंधली अनुभूति हम सब को छू गई है ऐसा कुछ जो जब कभी महसूस होता है हम हठात चौक से जाते हैं। एक अजीब सी छाया जो जब सरसराती सी हमें छूती हुई निकल जाती हैं, हमें लगता है जैसे हमारे भीतर एक अंधेरा खोखल- सा खुल गया है।”
मैं कई ऐसे लेखकों को जानता हूँ जो चुपके -चुपके निर्मल को पढ़ते हैं तथा दबी जुबाँ यह भी कहते हैं कि मैं भी निर्मल की गिरफ़्त में हूँ।
असल में, निर्मल ताउम्र अपनी डायरी में लिखते रहे कि मैं लेखन और व्यक्तित्व की खाई को पाटना चाहता हूँ।
वे आइसलैंड के नोबेल विजेता हालदौर विलियन लैक्सनेस का इंटरव्यू लेते हुए लिखते हैं कि मुश्किल और भी बढ़ जाती है जब बातचीत लैक्सनेस जैसे लेखक से हो, जो किसी भी विषय पर अपना निश्चित मत प्रकट करते हुए एक गहरी झिझक महसूस करते हैं।
ठीक यही बात निर्मल वर्मा के यहां आप देख सकते हो। वे बातचीत के दरमियाँ लंबा अंतराल लेते हैं।
मैंने जब भी उनके फुटकर वीडियो देखें तो स्वामीनाथन के साथ उसी निर्मलियत के साथ सिगरेट पीते हुए देखा।
इस समय सारा विश्व कोरोना की चपेट में है ऐसे समय में निर्मल होते तो क्या सोचते।
वे 23 अक्टूबर 1987 को लिखते हैं – ऐसे दिनों में लगता है ,जीना, सिर्फ जीना ,सिर्फ सांस लेना, धरती पर होना, चलना, सिर्फ देखना -यह कितनी बड़ी ब्लेसिंग है। अपनी तकलीफों, दुखों, अधूरे गड़बड़ कामों के बावजूद …और तब हमें उन लोगों की याद आती है, जो इतने बड़े थे और जिन्हें इतनी छोटी सी नियामत भी प्राप्त नहीं है, जो धरती पर रेंगती हुई चींटी को उपलब्ध है।

हम जीने के इतने आदी हो गए हैं कि जीवन का चमत्कार नहीं जानते। शायद इसी शोक में प्रूस्त ने कहा था- अगर आदत जैसी कोई चीज नहीं होती तब जिंदगी उन सबको अनिवार्यतः सुंदर जान पड़ती, जन्म मृत्यु कभी भी घेर सकती है यानी उन सबको जिन्हें हम मानवजाति कहते हैं।

(निर्मल वर्मा के जन्मदिन पर एक पीस)

◆ माधव राठौड़ ◆
राजस्थान के सुपरिचित कवि और कहानीकार है. इससे पूर्व अथाई पर उनकी कविताएँ प्रकाशित है. कॉमेंट बॉक्स लिंक शेयर किया है.

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