उड़ता पखेरू मांडै आखर गगन पै..


साहित्य का सृजन करना एक बात है और उस में व्यक्त आदर्शों एवं मूल्यों को जीवन में धारण करना दूसरी बात। कविता लिखे भी और कविता को जीए भी। ऐसे विरले ही लेखक -कवि होते है, जो सदियों में जन्मते है और अनन्त तक शब्दरूप में उपस्थित रहते है। ऐसे ही विरलेपन के धनी थे हिंदी और हाड़ौती के सिरमौर कवि रघुराज सिंह हाड़ा। जिनकी कलम से निकले शब्दों ने हाड़ौती को, बोली से भाषा तक यात्रा कराई। वो अक्सर कहा करते थे-” बोल्यां तो भासां की महतारियाँ छै।” यानी बोली भाषा की जननी है।

हाड़ौती-गीतों की बाळद लेकर ” बड़गांव का बंजारा” मझ दुपहर में खिलते ” फूल केसूला फूल” में ज़िन्दगी के रंग से
खूशबू हेरते चले गये। इस “काळचड़े” की काली छाया से कौन बचा हैं ? लेकिन आप का लिखा तो काल से परे है। वो अनन्तकाल की संजीवन है। आप के रचे शब्द-संसार में ” हाड़ौती गरिमा ” सदैव उज्जवलित रहेंगी। जन-जन “अणबांच्या आखर” बाँचते रहेंगे।

“उड़ता पखेरू मांडै आखर गगन पै
गूँगी धरा पै कोई बांचै नै बोले रे !”

आज 31 मार्च को आपका जीवन-दिवस था। और एक दिन पूर्व ही बिन संध्या देखे चले गए। बाघेर के डूँगर में
अस्ताचल हुआ सूरज बहुत उदास डूबा। ” कबूतरों के कई जोड़े धरा अनमने से रहे। सन 1962 में ” गौरव राजस्थान ” आरंभ हुई आपकी शब्द-यात्रा सन 2015 में बालगीतों के अंकुराने तक जारी रही। यह यात्रा ऐसे विराट कवि की यात्रा थी जिन्हें नए पौधों को अपने असीम स्नेह से सींचते रहना धर्म के पर्याय लगता था। लोक में पसरे दुःख और
चिंताओं पर मैंने आपकी आँखों को कई बार आँसूओं से भीगता देखा हैं।

मेरे स्मृति कोश से उनके आशीर्वचन को टटोलता हूँ तो ऐसा कई बार हुआ जब आप मेरी किसी कविता पढ़कर के उसी दिन, नहीं तो दूसरे दिन जरूर से फ़ोन करते थे और कहते थे -” अरे भाया ओम ! काल्ह थांरी कविता पढ़ी…बेटा खूब लिखो…अच्छी रचना को नहीं सराहना भी पाप से कम नहीं…आज थांरै फ़ोन न करतो तो पाप लाग जातो रे भाई ।” ऐसे निर्मल मन के धनी थे हम सब के श्रद्धेय ” वृक्षमित्र ” और “हरबोलो” के रचयिता कवि रघुराज सिंह हाड़ा।

आज आप के यूँ चले जाने के बाद गांव कै करड़े अकेली खड़ी खजूर और “म्हारो गांव भूतपट्टी छै” कविता स्मृति में
दस्तक दे रहीं है। अपने शब्दों में सब के सुख-दुःख गाकर ईश्वर के घर लौट गए-

” यूं तो कट रह्या छै म्हारा भी दन हज़ूर
गांव कै कराड़े जाणै एकलो खजूर।
न तो बनखण्ड ही न बस्ती को बास
हाय रे अकोळापण अर ये नसास,
जाणै कुण खावै, खर-खर जावै बूर।।”

आप ने करीब साठ वर्ष से अधिक समय तक साहित्य की सेवा की। अपनी बहुमुखी प्रतिभा से राजस्थानी व हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। आपका सृजन सदैव नयी पीढ़ी को प्रेरणा देता रहेगा। मुझे याद आ रहा है, आपने कुछ वर्ष पूर्व जब जोधपुर के राजस्थानी कवि पारस अरोड़ा जी ने आप को मेरे माध्यम से “अपरंच” पत्रिका में आपका साक्षात्कार छापने के लिए कुछ प्रश्न भेजे थे। तब आपने कविता को लेकर अपने विचार इस तरह से व्यक्त किए थे-” कोरी तुक मिलबो अर सुरताळ में गा लेबो कविता होती तो सारा ई कवि कहाता। म्हनै सोच कै पाण बात करणी-ई पै म्हारा माँसा नै घणी पहली एक अमरबात कह दी छी कै सोचै ऊं को मरण छै, जै न्हं सोचे ऊं को तो बेटा जीबो ई धिक्कार छै। म्हनै म्हारा रचाव में या कोसिस सदा याद रखाणबो चाही कै बिना सोच्यां मांडबा सूं तो न्हं मांडबो चोखो।” आप कविता के मर्म को भी समझते थे और कविता के धर्म को भी।

कतना माँडूं गीत – और म्हूं कतना गाऊँ गीत?
ऊपज’ तो भी अब राखूँ छूं मन की मन मँ, चीत!

आँसू अँखराऊँ क’ माँडूं हाँसी का चितराम
कोरो ज्ञान बघार’ कथणी जस तो झूठो नाम
नरी निभा दी रीत – और म्हूं कतना माँडूं गीत?

सुर कोरो आणन्द कान को सबद भरम को जाळ
मन तो राजी साँची गाताँ; पण जग नजराँ झाळ
कतना तोडूँ मीत – और म्हूं कतना माँडूं गीत?

ऊमर भर का गीत न गाळो भर गेहूँ निपजाय
काँईं करूँ कल्पना कोई क’ भी काम न आय
सह सह होग्यो भींत – और म्हूं कतना माँडूं गीत?

आज लिखूँ वा काल पुराणी जल की धार बिचार
मूंडा देख ’र तिलक लगाबो कलमाँ को रुजगार
बहुरूप्याँ की जीत – और म्हूं कतना माँडूं गीत?

लिख लिख लीप्यो म्हँन’ उजाळो कटी न काळी रात
पाछी आगी ईं घाटी मँ, गूंज ’र म्हारी बात
बारखड़ी गी बीत – और म्हूं कतना माँडूं गीत?

और म्हूं कतना माँडूं गीत?

याद करता हूँ तो उनकी संगत से सीखी कई बातें याद आ रहीं है। लेकिन अंतिम में एक याद मेरे सृजन यात्रा के आरंभ की है, यही सत्रह -अट्ठारह वर्ष पूर्व की बात है। बीए किया ही था। और अपनी हाड़ौती रचनाओं की किताब छपवाने की ज़िद कर बैठा। उस समय विभिन्न विधाओं के नियम कायदों की समझ भी परिपक्व नहीं थी। लेकिन ज़िद थी तो ज़िद थी। उस समय साहित्य जगत से पहचान कुछ विशेष थी नहीं। पांडुलिपि कई लोगों को दिखाई पर कोई बात बनती हुई नहीं लगी। तभी एक साहित्यिक कार्यक्रम के सिलसिले में मेरा झालावाड़ जाना हुआ। वहाँ आप से पहली बार वहीं मिला और मेरे कविता संग्रह की पांडुलिपी पर आप से दो शब्द लिखने का आग्रह किया।

आपने न केवल लिखने के लिए हाँ किया बल्कि यह भी कहा-” कोई बात कोई न्हं लिखे तो ,न्हं लिखे, चंता मत करै … म्हूं लिखूँगो थांरी किताब पै।” उस दिन शाम को मैं कोटा लौट आया। दूसरे दिन आपने मुझे कहा कि-“ओम ! म्हनै थांरी पांडुलिपि पढ़ बी ली अर एक टिपण्णी मांड बी दी…अर मांड म्हारा सिरहाना कै नीचे धर दी…डाक सूं भेजूं छूं एक दो दन में…। मैं आज भी यही सोच रहा हूँ उस समय आपने मुझ अकिंचन की राजस्थानी पांडुलिपि पर आशीर्वचन न लिखे होते तो शायद ही मैं सृजन की राह पर इतने कदम चल पाता। यह सब याद करते पलकें नम है। दूर भी बहुत हूँ, अंतिम दर्शन तक नहीं कर सका।

आपकी” वृक्षमित्र” कविता कौन बिसरा सकता है। जिस में वृक्ष की भाँति सबके सुख की कामना की। आप तो हमारा वटवृक्ष थे। अब इस सन्नाटे से भरे समय में हम पँछी किस डाल बैठेंगे।

” निर्वासित हो जाएँ राम तो मैं ही रैन बसेरा दूँगा
वेद मंत्र गूँजे, गौतम को बोध हुआ मेरी संगति में
मैं ही हूँ प्रकाश का साक्षी, मुझे न काटो
मैं तुम्हारा वृक्षमित्र हूँ…

मैं मुन्ना के लिए खिलौने और बाहों का पलना दूँगा
हर युग के गोपाल कन्हैया को कदम्ब की छाँव
और बंशीवट दूँगा
मैं तुम्हारा वृक्षमित्र हूँ।

स्मृतिशेष- कवि रघुराज सिंह हाड़ा
जन्म : 31 मार्च 1933
निधन : 30 मार्च 2020

◆ टिप्पणी- ओम नागर ◆

ओम नागर हाड़ौती राजस्थान के रहने वाले है. उनकी डायरियाँ बेहद चर्चित रही है. पूर्व में उनकी कविताएँ अथाई पर प्रकाशित है. वहाँ उनका परिचय भी है.

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