जितनी दिख रही है, बस उतनी सी नहीं है कहानी | अमृता मौर्य

सड़क पर सिर्फ लोग नहीं चलते, कहानियां भी साथ चलती हैं। इन कहानियों के पीछे कुछ और नई कहानियां जुड़ती हैं। आप कहाँ तक पीछा करेंगे इनका? थक जाएंगे मगर कहानी ख़त्म नहीं होगी। ये शुरू ही होती है नहीं ख़त्म होने के लिए।

नहीं ख़त्म होने वाली कहानी में नहीं ख़त्म होने वाला दर्द हमेशा औरत के हिस्से आता है। और इसे एक औरत की नज़र ही देख सकती है। लॉक डाउन ने श्रमिकों से रातोंरात उनकी छत छीन ली। खुद बड़ी छत के नीचे रहते – रहते लोग भूल जाते हैं कि उनके यहाँ जो छोटी छतों के नीचे रहते हैं, उन्हीं के कन्धों पर टिकी है ये बड़ी छत। छोटी छतों वाले नहीं लौटे तो बड़ी छतें ढह जाएँगी। आने वाले समय में वो हाहाकार मचाने वाले हैं सरकार के सामने! पैसे के लिए! मगर खुद दूसरों की हाहाकार नहीं सुनी।

आठ माह की गर्भवती महिला अपने पति के साथ मोटर साइकिल पर बैठ कर गांव जा रही है। सड़क किनारे रुक कर कुछ देर बैठती है, फिर सब चल पड़ते हैं। दो परिवार साथ हैं, दूसरे में भी एक महिला है। ऐसे ही पूरी रात रुकते-रुकते जाएंगे तो कल सुबह तक पहुँच जाएंगे। सोचने से बाहर की बात है कि वह किस मनोवेदना से गुजर रही होगी। माँ और अजन्मा बच्चा दोनों मौत के मुहाने पर हैं।

उस औरत का क्या कहें जो चलते-चलते सड़क किनारे सो गई। साथ चलनेवाला रेला आगे निकल गया। अब और नहीं चल सकती! एक कदम भी नहीं। चप्पल का तकिया बनाकर सो गई। थकने के बाद धूप-छाँव का पता नहीं होता।

बहुतों ने खाने बांटे, सरकारी सहायता भी आ गई। फिर भी खाना काम पड़ गया। आधे-आधे घंटे लाइन में लग के जिस औरत के हाथ 4 पूड़ियाँ आईं वो भीड़ से निकलकर भागती हुई बच्चों के पास गई। चारों बच्चों को एक-एक दे दी और खुद भूखी रह गई। उसे देखकर किसका कलेजा मुंह को नहीं आएगा? कइयों का नहीं आएगा, सच मानिए।

कुछ बांटनेवाले ऐसे भी थे जो बच्चों को भगा रहे थे, जैसे वे भिखारी हों। अगर कोई बच्चा दोबारा भी आ गया हो तो देने में हर्ज क्या है? बेचारा अपनी क्षमता से ज्यादा पैदल चल रहा है। वैसे इतनी भीड़ में बच्चे का हाथ ही छोटा पड़ रहा था खाने के लिए बढ़ाने को। लेकिन बांटनेवाले की फोटो जब महत्वपूर्ण होती है तो छोटे हाथ कुछ ज्यादा ही छोटे लगते हैं।

लोग घरों में बैठकर इनके लिए एक-एक मीटर की दूरी बनाने की बात कर रहे थे। उन्हें पता नहीं है कि भूख वास्तव में क्या होती है। भूख लगना और भूखों मरना – दोनों दो चीज़ है। स्वाभिमान को कैसे ताक पर रख कर हाथ फैलाया होगा, खुद पर सोचकर देखिए। भिखारी नहीं थे ये। हज़ारों की भीड़ ने फिर भी लूट नहीं मचाई।

यहाँ तो लोगों ने बैठे-बैठे अपने घर खाने मंगवाए। रसोई में सामान है लेकिन मुफ्त खाने का लालच कैसे छोड़ते? ये तो फिर भी कम है। लूट का आलम तो अब शुरू हुआ है। इन कुछ दिनों में ढेरों सहायता कोष अस्तित्व में आए हैं; छोटे से लेकर पीएम केयर्स फंड तक। जगह-जगह सांप इनपर कुंडली लगाए बैठे हैं। लोगों ने कम नहीं दिए, दिल खोलकर दिए हैं। छोटी आमदनी वाले लोग भी अपनी हैसियत के मुताबिक पैसे दे रहे हैं। बच्चे भी गुल्लक से पैसे निकल कर ले आए।

राहत सामग्री कहाँ पहुंचनी थी और कहाँ पहुँच गई- ये खबर बहुत जल्दी आने वाली है। कोष में जमा पैसों में अनियमितता तो होगी, लेकिन गया कहाँ ये पता नहीं लग पाएगा; चाहे कितनी कमिटियां बैठा लो। ये खेल नया नहीं है। काम वहीं होंगे जिन कोषों का सञ्चालन जिम्मेदार लोग कर रहे होंगे। बाकी तो दाएं हाथ का सामान बाएं हाथ में जाएगा; कुछ काम दिखाने के ज़रूर होंगे।

सलमान खान ने वेस्टर्न इंडिया सिने एम्पलॉइस के दैनिक काम पाने वाले 25,000 कलाकारों को आर्थिक सहायता देने की बात कही है और उसका भुगतान वह सीधा उनके खाते में करेंगे। इस बात को देखने का सबका अपना–अपना नजरिया हो सकता है। हर किसी को इस तरह दिया जाना भी संभव नहीं है। मगर सहायता राशि उस तक शत-प्रतिशत पहुंचे जिसके लिए दी गई है, यहाँ यह सुनिश्चित होता है। यही उसका उद्देश्य है।

विकट स्थितियों की मार तंगहाल लोगों पर अधिक पड़ती है और उस बहाने कुछ लोग अपनी खुशहाली का अतिरिक्त इंतज़ाम कर लेते हैं। ये ‘कुछ लोग’ और कोई नहीं, हमारे ही बीच के लोग हैं। अवसरवादी! धनलोलुप!

-अमृता मौर्य

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