रोहित ठाकुर की कविताएँ

[ उसे इस समय एक घड़ी चाहिए ]

उसे घर के खाली दीवार के लिए
एक दीवार घड़ी चाहिए
दरभंगा टावर की घड़ियाँ बंद रही
कई सालों तक
फिर वह शहर छूट गया
पिता की कलाई घड़ी बंद पड़ी है
उनके जाने के बाद
घड़ीसाज़ों की दुकानें बंद
हो रही है
फिल्मों में घड़ीसाज़ का किरदार –
अब कौन निभाता है
नींद में बजती रही है
घड़ी की अलार्म
पर उससे कुछ हासिल नहीं हुआ
तकनीकी रूप से
राजा और प्रजा की घड़ियाँ
समान होती है
पर समय निरंतर निर्मम होता जाता है
प्रजा के लिए
मैंने
उसे समझाया
कोई घड़ी
जनता के लिए जनता ही बनाती है
पर उसमें बजने वाले समय को
नियंत्रित करता है शासक
तुम बाजार से –
कोई भी घड़ी ले आओ
तुम्हारे हिस्से
नहीं आयेगा –
समय का उज्जवल पक्ष |

[ भाषा ]

वह बाजार की भाषा थी
जिसका मैंने मुस्कुरा कर
प्रतिरोध किया
वह कोई रेलगाड़ी थी जिसमें बैठ कर
इस भाषा से
छुटकारा पाने के लिए
मैंने दिशाओं को लाँघने की कोशिश की
मैंने दूरबीन खरीद कर
भाषा के चेहरे को देखा
बारूद सी सुलगती कोई दूसरी चीज
भाषा ही है यह मैंने जाना
मरे हुए आदमी की भाषा
लगभग जंग खा चुकी होती है
सबसे खतरनाक शिकार
भाषा की ओट में होती है |

[ बनारस ]

समय का कुछ हिस्सा
मेरे शहर में रह जायेगा
इस तरफ
नदी के
जब मेरी रेलगाड़ी
लाँघती रहेगी गंगा को
और हम लाँघते रहेंगे
समय की चौखट को
अपनी जीवन यात्रा के दौरान
अपनी जेब में
धूप के टुकड़े को रख कर
शहर – दर – शहर
बनारस
यह शहर ही मेरा खेमा है अगले कुछ दिनों के लिये
इस शहर को जिसे कोई समेट नहीं सका
इस शहर के समानांतर
कोई कविता ही गुजर सकती है
बशर्ते उस कविता को कोई मल्लाह अपनी नाव पर
ढ़ोता रहे घाटों के किनारे
मनुष्य की तरह कविता भी यात्रा में होती है |

[ घर ]

कहीं भी घर जोड़ लेंगे हम
बस ऊष्णता बची रहे
घर के कोने में
बची रहे धूप
चावल और आंटा बचा रहे
जरूरत भर के लिए

कुछ चिड़ियों का आना-जाना रहे
और
किसी गिलहरी का

तुम्हारे गाल पर कुछ गुलाबी रंग रहे
और
पृथ्वी कुछ हरी रहे
शाम को साथ बाजार जाते समय
मेरे जेब में बस कुछ पैसे |

◆रोहित ठाकुर
दरभंगा, बिहार

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